विशेष इन-डेप्थ रिपोर्ट (नई दिल्ली)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की युवा पीढ़ी (Gen-Z) और उनके सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने अधिकारों, मांगों या असहमति को व्यक्त करने के लिए विरोध प्रदर्शन करने मात्र से कोई युवा या छात्र ‘देशविरोधी’ नहीं हो जाता।
संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि आज की नई पीढ़ी पर आंख मूंदकर विश्वास जताया जा सकता है, क्योंकि वे देश के अपने ही बच्चे हैं। यदि उनके मन में कोई आक्रोश या असंतोष है, तो उसका समाधान दमन या आक्षेप लगाने से नहीं, बल्कि खुले मन से सार्थक संवाद और आत्ममीमांसा के जरिए ही संभव है।
१. युवा पीढ़ी पर पूर्ण विश्वास और ‘देशविरोधी’ ठप्पे का विरोध
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने वर्तमान दौर के युवाओं की मानसिकता और उनकी सोच पर संघ के दृष्टिकोण को रेखांकित किया:
लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान: उन्होंने कहा कि जब युवा किसी मुद्दे पर सड़कों पर उतरते हैं या अपनी आवाज उठाते हैं, तो यह उनकी सजगता का प्रतीक है। केवल व्यवस्था या नीतियों से असहमति जताने के कारण उन पर ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘देशद्रोही’ का टैग लगाना पूरी तरह अनुचित है।
Gen-Z की क्षमता पर भरोसा: संघ प्रमुख ने रेखांकित किया कि आज की पीढ़ी (Gen-Z) अत्यंत जागरूक, तकनीकी रूप से सक्षम और देश के भविष्य को गढ़ने वाली है। उन्होंने कहा कि बड़े बुजुर्गों और तंत्र को युवाओं की नीयत पर संदेह करने के बजाय उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने का प्रयास करना चाहिए।
२. टकराव के बजाय संवाद और आत्मीयता का मार्ग
बढ़ते सामाजिक और वैचारिक मतभेदों के बीच संघ प्रमुख ने समाधान के रूप में ‘संवाद’ को सबसे शक्तिशाली माध्यम बताया:
“वे हमारे अपने बच्चे हैं”: असंतुष्ट या प्रदर्शनकारी छात्रों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वे समाज का ही हिस्सा हैं। जब घर का कोई बच्चा किसी बात से नाराज होता है, तो उससे दूरी बनाने के बजाय उसे बुलाकर उसकी बात सुनी जाती है।
संस्थागत संवाद की आवश्यकता: सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को चाहिए कि वे युवाओं के लिए अपनी बात रखने के पारदर्शी मंच तैयार करें। किसी भी भ्रम या असंतोष को केवल आपसी बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है।
३. बयान के सामाजिक और राजनीतिक मायने
सरसंघचालक के इस बयान को वर्तमान सामाजिक परिवेश और देश भर में चल रहे विभिन्न छात्र आंदोलनों के संदर्भ में बेहद रणनीतिक और सकारात्मक माना जा रहा है:
सहिष्णुता और समावेशिता का संदेश: इस बयान को संघ के उस व्यापक दृष्टिकोण से जोड़कर देखा जा रहा है जहाँ समाज के सभी वर्गों, विशेषकर युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय मुख्यधारा में जोड़ने पर बल दिया जा रहा है।
पूर्वाग्रहों को समाप्त करने का प्रयास: मीडिया और जन-विमर्श में अक्सर प्रदर्शनकारी छात्रों पर लगने वाले राजनीतिक आक्षेपों के बीच संघ प्रमुख का यह रुख युवाओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और सुधारात्मक सोच को बढ़ावा देता है।
४. राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका
मोहन भागवत ने इस बात पर भी ध्यान केंद्रित किया कि भारत एक युवा देश है और देश की नियति इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी युवा शक्ति को कैसे दिशा देते हैं:
ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग: युवाओं में मौजूद नवाचार, बदलाव की चाह और सामाजिक न्याय की भावना को दबाने के बजाय उसका उपयोग राष्ट्र निर्माण के कार्यों में किया जाना चाहिए।
मार्गदर्शन की आवश्यकता: उन्होंने कहा कि बड़ों का कर्तव्य केवल उपदेश देना या आलोचना करना नहीं, बल्कि युवाओं के प्रश्नों का उत्तर देना और उन्हें सही-गलत का विवेक प्रदान करना है।
निष्कर्ष
RSS प्रमुख मोहन भागवत का यह वक्तव्य केवल एक बयान नहीं, बल्कि आज के सामाजिक परिदृश्य में एक अत्यंत व्यावहारिक संदेश है। विरोध प्रदर्शनों को शत्रुता की दृष्टि से देखने के बजाय युवाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकारना और समस्याओं का समाधान ‘संवाद’ के जरिए खोजना ही एक परिपक्व और मजबूत लोकतंत्र की सच्ची पहचान है।
राष्ट्रीयता और युवा चेतना: RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान, ‘विरोध प्रदर्शन करने से युवा देशविरोधी नहीं हो जाते, संवाद से संभव है समाधान’









