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इंडोनेशिया के संग्रहालय की शोभा बढ़ाएगा 860 ईस्वी का नालंदा ताम्रपत्र

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जकार्ता। इंडोनेशिया गणराज्य के संस्कृति मंत्रालय ने भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय द्वारा भेंट किए गए नालंदा ताम्रपत्र (रेप्लिका) की विशेष रूप से बनाई गई प्रतिकृति को मुआरा जंबी में बन रहे नए संग्रहालय में शामिल करने के लिए एक यादगार कार्यक्रम आयोजित किया। यह कदम दोनों देशों के बीच मजबूत सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को दर्शाता है। नालंदा ताम्रपत्र भारत और इंडोनेशिया के इतिहास और विरासत को जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण तथा प्रतीकात्मक पुल के रूप में कार्य करता है, जो सदियों से साझा सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित है।
इस कार्यक्रम में इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्री पाक फदली जोन के साथ ही जकार्ता में भारतीय राजदूत संदीप चक्रवर्ती ने शिरकत की। जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास ने एक बयान में कहा इस महीने की शुरुआत में 8 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति (आईजीसी) की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा’ के लिए बैठक के दौरान, भारत ने इंडोनेशिया को मूल नालंदा ताम्रपत्र की एक प्रतिकृति भेंट की थी, जो वर्तमान में नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थापित है।
भारत की यह विशेष पहल जनवरी 2025 में राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की भारत यात्रा के दौरान इंडोनेशिया द्वारा किए गए एक अनुरोध के बाद की गई थी। इसके बाद जकार्ता में भारतीय दूतावास और नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय ने इंडोनेशिया को यह प्रतिकृति सौंपने के लिए जरूरी औपचारिकताएं पूरी की।
भारतीय दूतावास के मुताबिक नालंदा ताम्रपत्र, जो लगभग 860 ईस्वी का है, देवनागरी लिपि और संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है और इसे बंगाल के राजा देवपाल के अधिकार के तहत जारी किया गया था। इसमें राजा द्वारा नालंदा महाविहार को पांच गांवों के अनुदान का दस्तावेजीकरण किया गया है, जो सुवर्णद्वीप (वर्तमान सुमात्रा) के शासक महाराजा बालपुत्र देव के अनुरोध पर बिहार में नालंदा मठ में भिक्षुओं के रखरखाव और पांडुलिपियों की प्रतिलिपि बनाने के लिए किया गया था। नालंदा ताम्रपत्र पहला प्रलेखित शिलालेख है, जो सुमात्रा के महाराजा बालपुत्र देव के बारे में जानकारी देता है। यह भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय की बहुमूल्य संपत्तियों में से एक है और कई विद्वानों, इतिहासकारों और पुरालेखविदों को आकर्षित करता है।
(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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