16 अक्टूबर 2025
वर्षा चमोली

उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में भीमताली शैली की रामलीला विश्वविख्यात है, जो रामचरितमानस की चौपाइयों और दोहों पर आधारित दस रात्रियों का महाकाव्य गीत नाट्य है। विभिन्न रागों में गाए जाने वाले इस सशक्त मंचन ने वैश्विक पटल पर ख्याति अर्जित की है। इस वर्ष भतरौंजखान कस्बे में रामलीला कमेटी द्वारा 4 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित यह रामलीला स्थानीय 22 गांवों के सहयोग से भव्य रूप ले रही है।
हरीश भट्ट की अध्यक्षता और दीपक छिमवाल के कुशल निर्देशन में रात 8 बजे से 1 बजे तक ठंड की मार झेलते हुए भी हजारों दर्शक मंत्रमुग्ध हो रहे हैं। आर्थिक सहायता और अपार भीड़ से यह आयोजन अंचल की लोक संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक बन गया है। श्रीगणेश प्रमुख नागरिकों जैसे हरीश खुल्बे, जगदीश शर्मा, भगवत वर्मा, डॉ. रघुवीर पंत आदि के सहयोग से हुआ।
मंचन में संवाद, संगीत और अभिनय का अनोखा संगम है। सीता स्वयंवर का विदाई दृश्य भावुक कर गया, तो परशुराम-लक्ष्मण और अंगद-रावण संवादों ने तालियां बटोरीं। मुख्य पात्रों में राम (कृष्ण पंत), लक्ष्मण (कृष्ण भट्ट), सीता (दीपांशु पंत), हनुमान (भगवत बर्मा), रावण (चंदन कड़ाकोटी), परशुराम (प्रकाश पंत), कुंभकर्ण (प्रदीप पंत) और शबरी (राजेंद्र पांडे) ने मधुर गायन व प्रभावी अभिनय से दर्शकों को आत्मविभोर किया। वेशभूषा रामकथा के अनुरूप भव्य रही।
भीमताली शैली की राग-आधारित संरचना पात्रों के गायन से चरित्रों को जीवंत करती है, जो कुमाऊं की परंपरा का मूल है। कमेटी ने इसे अक्षुण्ण रखा है। अध्यक्ष हरीश भट्ट ने चिंता जताई कि ग्रामीण रामलीलाओं में वादक और हारमोनियम मास्टर कम हो रहे हैं। युवा पलायन से 12-13 वर्ष के नौनिहालों को प्रशिक्षित कर मंच दिया जा रहा है, जो बड़े होकर शहर चले जाते हैं। फिर भी, मानस की चौपाइयां और धुनें स्थानीयों में रची-बसी हैं, जिससे कोई भी उत्साही पात्र की कमी पूरी कर लेता है।
यह रामलीला उत्तराखंडी आस्था का प्रतीक है, जो जीवन में उतरकर संस्कृति को जीवित रखती है। आयोजन की सफलता लोकभक्ति और सामूहिक प्रयास का जीता-जागता उदाहरण है।







