नई दिल्ली/ 24 December 2025
Report: Varsha Chamoli
GSST/ डेस्क: देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में किए गए बदलाव के बाद देशभर में विरोध तेज हो गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह फैसला प्रकृति संरक्षण से ज़्यादा खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है।
नई परिभाषा के अनुसार अब केवल वही भू-भाग “अरावली पहाड़ी” माना जाएगा, जिसकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। साथ ही, दो या उससे अधिक पहाड़ियों को तभी एक श्रृंखला माना जाएगा, जब उनके बीच की दूरी 500 मीटर से कम हो। इस बदलाव के चलते कई ऐसे क्षेत्र, जो अब तक अरावली का हिस्सा माने जाते थे, नई परिभाषा से बाहर हो गए हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली केवल ऊंचाई से तय होने वाली पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। कई ऐसी पहाड़ियां जो 100 मीटर से कम ऊंची हैं, भूजल संरक्षण, हरियाली और तापमान संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नई परिभाषा लागू होने से इन क्षेत्रों में खनन और निर्माण का रास्ता खुलने की आशंका जताई जा रही है।
इसी आशंका के चलते देश के कई हिस्सों—खासतौर पर गुरुग्राम, फरीदाबाद, उदयपुर और राजस्थान-हरियाणा सीमा क्षेत्रों—में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर यह परिभाषा लागू होती है, तो अरावली का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।
वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि नई परिभाषा का उद्देश्य अरावली को कमजोर करना नहीं, बल्कि नियमों को स्पष्ट और एकरूप बनाना है। सरकार के मुताबिक, अस्पष्ट नियमों के कारण लंबे समय से कानूनी उलझनें बनी हुई थीं, जिनका फायदा अवैध खनन करने वाले उठा रहे थे। नई व्यवस्था से निगरानी मजबूत होगी और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकेगी।
इसी बीच सरकार ने एक और अहम फैसला लेते हुए अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की नई खनन गतिविधि पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सभी राज्यों को निर्देश जारी कर साफ कर दिया है कि अब अरावली क्षेत्र में नए माइनिंग लीज नहीं दिए जाएंगे। सरकार का कहना है कि अवैध खनन से पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा है और भूजल स्तर तेजी से गिरा है, जिसे रोकना अब जरूरी हो गया है।
कुल मिलाकर, अरावली को लेकर सरकार और पर्यावरणविदों के बीच टकराव और गहराता जा रहा है। एक तरफ सरकार नियमों को स्पष्ट करने और संरक्षण की बात कर रही है, तो दूसरी ओर विशेषज्ञों को आशंका है कि कहीं विकास के नाम पर देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को अपूरणीय क्षति न पहुंच जाए। आने वाले समय में यह मुद्दा पर्यावरण और राजनीति दोनों स्तरों पर और भी अहम बन सकता है।









