नई दिल्ली, 13 नवंबर 2025:
वर्षा चमोली

दिल्ली के शहरी विकास मंत्री आशीष सूद ने आज भलस्वा लैंडफिल साइट का निरीक्षण किया और वहां चल रहे बायो-माइनिंग, कचरा प्रोसेसिंग तथा प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित कार्यों की समीक्षा की। निरीक्षण के दौरान दिल्ली नगर निगम (MCD) के वरिष्ठ अधिकारी और संबंधित विभागों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
मंत्री ने बताया कि यह निरीक्षण उनकी पिछली विजिट (17 सितंबर 2025) में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा के लिए किया गया है। उन्होंने कहा कि भलस्वा साइट पर प्रतिदिन करीब 4000 मीट्रिक टन नया कचरा आता है, जिसके साथ पुराने कूड़े का भी वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जा रहा है।
निरीक्षण के दौरान पाया गया कि लैंडफिल साइट पर चल रही मशीनों और कूड़ा ढोने वाले वाहनों से धूल और डीजल प्रदूषण काफी मात्रा में फैल रहा है।
क्यो की प्रतिदिन 800 से अधिक वाहन यहां कूड़ा डालने आते हैं, जिनमें करीब 7000 लीटर डीजल खर्च होता है। साथ ही, 16 ट्रॉमल मशीनें कचरे की प्रोसेसिंग में लगी हैं, जिनसे उठने वाली धूल भी वायु प्रदूषण को बढ़ा रही है।
इस समस्या से निपटने के लिए सूद ने अधिकारियों को तत्काल 6 एंटी-स्मॉग गन और 12 स्प्रिंकलर मशीनें लगाने के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने कहा कि भलस्वा साइट को प्रदूषण के दृष्टिकोण से ‘हॉटस्पॉट’ घोषित किया जाए, ताकि इस क्षेत्र पर विशेष निगरानी रखी जा सके।
मंत्री ने निर्देश दिया कि पूरे क्षेत्र का ड्रोन सर्वे कराया जाए और साइट पर बचे हुए कचरे का अलग से असेसमेंट रिपोर्ट तैयार कर 10 दिनों के भीतर प्रस्तुत की जाए।
उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट रूप से पता चल सके कि अब तक कितनी मात्रा में कचरा निस्तारित हुआ है और कितना शेष है।
आपको बता दें कि भलस्वा लैंडफिल साइट वर्ष 1994 में शुरू हुई थी और 2019 तक इसकी ऊँचाई लगभग 65 मीटर तक पहुँच गई थी। उस समय यहां लगभग 80 लाख मीट्रिक टन लिगेसी वेस्ट (पुराना कचरा) जमा था।
वर्ष 2022 में यह मात्रा घटकर लगभग 73 लाख मीट्रिक टन रह गई।
जुलाई 2022 से लेकर 7 नवंबर 2025 तक यहां 36.29 लाख मीट्रिक टन ताजा कचरा, सिल्ट और मलबा डंप किया गया। इस प्रकार साइट पर अब तक कुल 109.29 लाख मीट्रिक टन कचरा रहा, जिसमें से 68.82 लाख मीट्रिक टन कचरे की बायो-माइनिंग पूरी की जा चुकी है।
अब भी करीब 40.47 लाख मीट्रिक टन कचरा साइट पर शेष है।


मंत्री सूद ने कहा कि सरकार आने के बाद बायो-माइनिंग के काम में तेजी आई है और आने वाले दिनों में इसके परिणाम साफ नजर आएंगे। बताया कि भलस्वा साइट पर अब 10 एकड़ अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई गई है, जहां दिसंबर 2025 तक गीले कचरे की प्रोसेसिंग यूनिट शुरू कर दी जाएगी।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं, क्योंकि ऐसी घटनाएं वायु प्रदूषण को और बढ़ा देती हैं।
भलस्वा साइट पर करोल बाग, एसपी और नरेला जोन के कुल 23 वार्डों का कूड़ा आता है।
मंत्री ने कहा कि इस लैंडफिल साइट के कारण बादली, जहांगीरपुरी, मॉडल टाउन, शालीमार बाग और आदर्श नगर जैसे इलाकों में प्रदूषण का असर सबसे अधिक देखा जा रहा है।
उन्होंने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि नया कचरा आने के साथ-साथ उसका प्रतिदिन निपटान भी हो ताकि “नए कूड़े के पहाड़” न बनें।
सूद ने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या केवल राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आसपास के राज्यों के औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे नरेला, खरखौदा आदि) का भी योगदान है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार की प्राथमिकता एक स्वच्छ और स्वस्थ राजधानी बनाना है। लैंडफिल साइटों का वैज्ञानिक प्रबंधन, कूड़े का पृथक्करण और रीसाइक्लिंग पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि आने वाले समय में दिल्ली को ‘लैंडफिल-मुक्त’ बनाया जा सके।
अंत में मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार राजधानी को कचरे के पहाड़ों से मुक्त करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है
आपको बता दे कि दिल्ली कूड़ा के पहाड़ का मुद्दा एक राजनीतिक दल का अहम मुद्दा है दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसकी सफ़ाई के बारे में दिल्ली के जानता के सामने अहम मुद्दा बताया और विपक्ष हमेशा इसमें दिल्ली सरकार को घेरता रहता है,
आपको बता दें की दिल्ली में कूड़े के पहाड़ों का मुद्दा लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहा है।
दिल्ली विधानसभा चुनावों में यह विषय कई बार मुख्य चुनावी एजेंडा बन चुका है।भारतीय जनता पार्टी (BJP) लगातार इन लैंडफिल साइटों की सफाई और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर दिल्ली सरकार को कठघरे में खड़ा करती रही है, जबकि सरकार का दावा है कि बायो-माइनिंग और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर अब पहले से कहीं ज्यादा तेजी से काम हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भलस्वा, गाजीपुर और ओखला जैसे “कचरे के पहाड़” दिल्ली की पर्यावरणीय छवि पर धब्बा बने हुए हैं और इनका समाधान राजनीतिक संकल्प, तकनीकी निवेश और ठोस कार्ययोजना से ही संभव है।
