छठ पूजा : आस्था, पर्यावरण और सामाजिक समरसता का पर्व 🌅

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Varsha Chamoli

भारतवर्ष त्योहारों की भूमि है, जहाँ हर पर्व अपने साथ कोई न कोई आध्यात्मिक संदेश लेकर आता है। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है छठ पूजा, जो सूर्य उपासना का सबसे बड़ा और प्राचीन त्योहार माना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाई जाती है, लेकिन आज इसकी आस्था की ज्योति पूरे देश और विदेशों तक फैल चुकी है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो सामान्यतः दीपावली के छठे दिन पड़ती है।

पूजा का महत्व

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव ही जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के स्रोत हैं। उनके आशीर्वाद से पृथ्वी पर जीवन संभव है। श्रद्धालु इस पर्व में अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य और उदयाचलगामी (उगते) सूर्य दोनों को अर्घ्य देते हैं। यह परंपरा जीवन के संतुलन का प्रतीक है—जहाँ अस्त का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है जितना उदय का स्वागत।

व्रत की कठोरता

छठ व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। व्रती (मुख्य रूप से महिलाएँ, जिन्हें ‘पार्वती’ कहा जाता है) चार दिनों तक अत्यंत नियम, पवित्रता और तप के साथ पूजा करती हैं।

  1. पहला दिन – नहाय-खाय: व्रती नदी या तालाब में स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं।
  2. दूसरा दिन – खरना: इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं और सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर व रोटी का प्रसाद ग्रहण करती हैं।
  3. तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य: शाम के समय व्रती घाट पर जाकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देती हैं।
  4. चौथा दिन – उषा अर्घ्य: सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है।

पर्यावरण और सामूहिकता का संदेश

छठ पूजा का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह प्रकृति और स्वच्छता से सीधा जुड़ा हुआ पर्व है। लोग घाटों की सफाई करते हैं, नदियों और तालाबों को पवित्र मानते हैं, और सामूहिक रूप से पूजा करते हैं। इससे समाज में एकता, सहयोग और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है।

छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता, अनुशासन, पर्यावरण और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। सूर्य उपासना के माध्यम से यह हमें सिखाती है कि प्रकृति का सम्मान करें, सत्य और संयम के मार्ग पर चलें, और जीवन के हर चरण को आभार के साथ स्वीकार करें।

इस पर्व की यही अनोखी भावना इसे भारत के सबसे पवित्र और लोकप्रिय त्योहारों में स्थान देती है। 🌞🙏

पोलिटिकल एंगल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में घोषणा की है कि केंद्र सरकार छठ महापर्व को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए कृतसंकल्पित है। यह कदम छठ को ‘ग्लोबल फेस्टिवल’ बनाने की दिशा में ऐतिहासिक साबित होगा, ठीक वैसे ही जैसे कोलकाता की दुर्गा पूजा को वैश्विक मान्यता मिली थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने 28 सितंबर 2025 को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा, “छठ पूजा अब एक स्थानीय परंपरा से निकलकर वैश्विक त्योहार बन रही है। हमारी सरकार यूनेस्को में इसे शामिल कराने के लिए प्रयासरत है, ताकि दुनिया भर के लोग इसकी भव्यता और दिव्यता का अनुभव कर सकें।” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह पर्व प्रकृति पूजा का प्रतीक है, जहां उगते और अस्त होते सूर्य को समर्पित भक्ति से भारत की सांस्कृतिक धरोहर जीवंत होती है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में 1300 से अधिक घाटों पर पूजा का आयोजन होगा, जिसमें यमुना नदी के किनारे 17 मॉडल घाट विशेष आकर्षण का केंद्र बनेंगे। इन घाटों पर टेंट, लाइटिंग, पानी की आपूर्ति, स्वच्छता सुविधाएं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।


मुख्यमंत्री गुप्ता ने 22 अक्टूबर को द्वारका के पॉचनपुर घाट का निरीक्षण किया और कहा, “छठ पूजा को दिवाली जितना ही भव्य रूप से मनाया जाएगा। सभी लंबित कार्य तेजी से पूरे किए जा रहे हैं।” दिल्ली सरकार ने 27 अक्टूबर (संध्या अर्घ्य) को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है, जबकि 28 अक्टूबर को सरकारी कार्यालय पूर्ण रूप से बंद रहेंगे। यह पहली बार है जब छठ के लिए 1.5 दिन का अवकाश दिया गया है, जो पूर्वांचली समुदाय की भावनाओं का सम्मान दर्शाता है।वही दूसरी तरफ़ विपक्ष का आरोप आया AAP के वरिष्ठ नेता और पूर्व जल मंत्री सौरभ भारद्वाज ने 22 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “बिग ब्रेकिंग न्यूज: आज सुबह 5:45 बजे का यमुना जी का वीडियो। यमुना में प्रदूषण और झाग भरा पड़ा है। अभी दो दिन पहले रेखा गुप्ता जी ने ऐलान कर दिया था कि उन्होंने यमुना साफ कर दी। हमने पहले ही बताया था कि ये सिर्फ झाग कम करने वाले केमिकल की वजह से है। आज इनकी पोल खुल गई।” भारद्वाज ने सवाल उठाया कि ऐसी जहरीली नदी में भक्तजन कैसे अर्घ्य चढ़ाएंगे? उन्होंने चेतावनी दी कि इससे भक्तों के स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है, खासकर महिलाओं और बच्चों को।

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