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जयशंकर का लाल किले से संदेश- अमूर्त विरासत है मानवता की साझा पूंजी

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नई दिल्ली।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमूर्त विरासत को मानवता की साझा पूंजी बताते हुए कहा है कि परंपराएं, भाषाएं, संगीत, शिल्पकला और अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के अन्य स्वरूप मानव संस्कृति की सबसे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति है, जो सभी की साझा संपत्ति है तथा सभी के द्वारा संरक्षित की जाती है।
डॉ. जयशंकर ने 7 दिसंबर को लाल किले में आयोजित अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर यूनेस्को की महत्वपूर्ण बैठक के उद्घाटन समारोह में यूनेस्को की भूमिका को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया और कहा कि विरासत को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी वैश्विक समुदाय की सामूहिक प्रतिबद्धता है।
विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार मंत्री ने कहा एक संस्थापक सदस्य के रूप में भारत ने शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति में गहन सहयोग के माध्यम से वैश्विक शांति और समझ को बढ़ावा देने के यूनेस्को के उद्देश्यों को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में, मानव जाति को अपने पूर्वजों की विरासत से लाभ हुआ है। जैसे-जैसे हम प्रगति और समृद्धि की साझा खोज में आगे बढ़ते हैं, यह आवश्यक है कि हम इस विरासत का पोषण करें और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। कई यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों का घर होने के अलावा, भारत ने स्वयं दुनिया भर में कई संरक्षण और संवर्धन परियोजनाएं शुरू की हैं।
बता दें कि भारत पहली बार इस अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की मेजबानी कर रहा है, जो 8 से 13 दिसंबर तक चलेगा। इस दौरान विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में नामांकन पर विचार करेंगे, मौजूदा प्रविष्टियों की स्थिति की समीक्षा करेंगे तथा संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता पर अंतिम निर्णय लेंगे। भारत ने इस मौके पर विषयगत दीर्घाओं से लेकर पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं तक, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को लाल किला परिसर में भव्य रूप से प्रदर्शित किया है।
(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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