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पहाड़ बचेगा, तो पहचान बचेगी.. लुप्त होती सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए उत्तराखंड निवासियों की चिंता।

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लेखक: वर्षा चमोली

जहाँ हवा में देवदार की खुशबू बसी हो… जहाँ पानी इतना साफ हो कि आकाश दिख जाए… वो भूमि है उत्तराखंड।
लेकिन इस शांति के पीछे एक सन्नाटा है…

एक सन्नाटा, जो हमारी संस्कृति के खो जाने का संकेत दे रहा है।

कभी इन पहाड़ों की हर घाटी में लोकगीत गूंजते थे। हर घर में तांबे की थाली में झंगोरे की खीर, उरद की दाल, भट्ट का दुंबु, मंडुए की रोटी की खुशबू आती थी। शादियों में रंग-बिरंगा घाघरा, पाँरियूँ, चांदी की ज्वैलरी… और त्यौहारों में रामलीला, चाचरी, झोड़ा, तांदी—हर कदम पर संस्कृति की धड़कनें सुनाई देती थीं।

लेकिन आज…
ये आवाज़ें धीमी हो रही हैं।
ये स्वाद गायब हो रहे हैं।
ये पहनावे अब प्रदर्शनियों में कैद होकर रह गए हैं।

पहाड़ से हो रहा पलायन

आज उत्तराखंड का सबसे बड़ा दर्द है– पलायन।
जब लोग ही गाँवों से जा रहे हैं, तो संस्कृति किसके सहारे जिंदा रहे?
• बाड़-बकरियाँ, खेत-खलिहान छोड़ दिए गए।
• पारंपरिक खेती खत्म हुई → पारंपरिक भोजन भी खत्म होने लगा।
• सांस्कृतिक कार्यक्रमों में युवा कम, बुजुर्ग ज्यादा।

संस्कृति का रखवाला कौन? जब गाँव ही खाली हो जाए।

पलायन के साथ साथ विलुप्त होता जा रहा यहाँ का खान-पान, क्यो की खेती करने वाले तो दिल्ली मुंबई में बैठ कर ब्लिंकिट बिग बास्केट कर रहे और यहाँ टूरिज़म के नाम पर शहरी आकर मैगी जैसे विदेशी नाम को हमारे पहाड़ से जोड़ दिया “पहाड़ी मैगी “और हमारा उत्तराखंड का अपना ख़ान पान जो कभी सिर्फ स्वाद नहीं था—
वह था स्वास्थ्य, परंपरा, पहचान।

लेकिन आज?
जंक फूड की चकाचौंध ने पहाड़ी भोजन को पीछे धकेल दिया है।

•   स्थानीय दालें– भट्ट, गहत, झंगोरा—खेती से लगभग गायब होते जा रहे 
•   होटल-रेस्टोरेंट में ‘पल्सी-मंडुआ’ की रोटी तो है, पर सिर्फ “टूरिज्म मेन्यू” के लिए।
•   युवा पीढ़ी को ये व्यंजन नाम तक याद नहीं।

चलिए अगर हम खाने से ऊपर उठे तो हमारा पहनावा भी लुप्त होता दिखता है

घुघती जैसी गहनों की झंकार से लेकर लाल-पीले घाघरों की चमक— हमारा पहनावा सिर्फ कपड़ा नहीं था… यह इतिहास था, यह पहचान था।

लेकिन आज:
• पारंपरिक बुनाई करने वाले कारीगरों की संख्या तेजी से घट रही है।
• ऊन उद्योग कमजोर, स्थानीय बाजार खत्म।
• त्योहारों में भी पहनावा “फैशन शो” की तरह, परंपरा की तरह नहीं।

इसी के साथ साथ लोकगीत, भाषा और कला भी मानो यूट्यूब तक ही सीमित रह गया है

आज पहाड़ की बोली—गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी—
सिर्फ बुजुर्गों की जुबान पर रह गई है।
युवा अंग्रेजी-हिंदी में ही बड़े हो रहे हैं।

लोकनृत्य करने वाले समूह कम,
रमौलियाँ, जागर, चांचरी—अब सिर्फ YouTube की वीडियो में कैद हैं।

इसका समाधान क्या है ? अगर हम सरकार की बात करे तो सरकार इसके लिए क्या कर रही है?

कुछ सीधा सीधा सवाल सरकार से :

1.  क्या पहाड़ी भोजन को स्कूलों, होटलों और सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य बनाने की कोई नीति है?
2.  क्या मंडुवा, झंगोरा, भट्ट जैसी स्थानीय फसलों की खेती बढ़ाने के लिए पर्याप्त सब्सिडी है?
3.  क्या पहाड़ी भोजन को GI टैग और राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
  1. उत्तराखंड हैंडलूम और स्थानीय कारीगरों को बचाने के लिए कौन से मजबूत कदम हैं?
  2. क्या पारंपरिक पहनावे को स्कूल/कॉलेज के विशेष दिवसों, सरकारी आयोजनों में अनिवार्य किया जाएगा?
  3. क्या कारीगरों के लिए स्थायी बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म प्रदान करने की कोई नीति है?
  4. क्या हमारी बोलियों को शिक्षा में शामिल न्ही किया जाना चाइए ?
  5. क्या लोककलाओं को संरक्षित करने के लिए स्थायी फंड, मंच और रोजगार उपलब्ध कराए गए?
  6. क्या हर जिले में संस्कृति केंद्र खोलने की कोई योजना है?

हम सरकार से सिर्फ मांग नहीं कर रहे,
हम याद दिला रहे हैं—
किसी भी राज्य की असली पहचान उसकी संस्कृति होती है।

अगर हम आज नहीं जागे तो
आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
“हमारे पहाड़ की असली पहचान कहाँ गई?”

उत्तराखंड की संस्कृति सिर्फ धरोहर नहीं
यह हमारे होने का प्रमाण है।
इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है…

पहाड़ बचेगा… तो पहचान बचेगी

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