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किसान परिवार की बेटी ने रचा इतिहास, एवरेस्ट फतह करने वाली पहली जनजातीय महिला बनीं विनीता सोरेन

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विनीता सोरेन, झारखंड की जनजातीय महिला, ने माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचा। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद यह उपलब्धि हासिल की।

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के एक छोटे से गांव केसोरसोरा से निकलकर विनीता सोरेन ने वह कर दिखाया, जिसका सपना लाखों लोग देखते हैं। सीमित संसाधनों और अभावों के बीच पली-बढ़ीं विनीता ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। वह एवरेस्ट फतह करने वाली भारत की पहली जनजातीय महिला बनीं।

संघर्षों के बीच शुरू हुआ सफर

विनीता सोरेन का जन्म 21 जून 1987 को झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के एक साधारण जनजातीय किसान परिवार में हुआ था। आर्थिक चुनौतियों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया।उनके जीवन में निर्णायक मोड़ वर्ष 2004 में आया, जब उनकी मुलाकात Bachendri Pal से हुई। बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन और प्रेरणा ने विनीता के भीतर पर्वतारोहण के प्रति गहरी रुचि पैदा की।

सात वर्षों की कठिन तैयारी के बाद मिली सफलता

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कोई सामान्य उपलब्धि नहीं होती। इसके लिए विनीता ने लगभग सात वर्षों तक कठिन शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण लिया। बर्फीले तूफानों, कड़ाके की ठंड और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच उन्होंने खुद को तैयार किया।’इको एवरेस्ट स्प्रिंग अभियान’ के तहत उन्होंने 20 मार्च 2012 को जमशेदपुर से अपनी यात्रा शुरू की। कई कठिन पड़ाव पार करने के बाद 26 मई 2012 की सुबह 6:50 बजे उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी Mount Everest पर पहुंचकर भारतीय तिरंगा फहरा दिया।

एवरेस्ट विजय के बाद विनीता सोरेन का साहसिक अभियान नहीं रुका। उन्होंने कई राष्ट्रीय स्तर के अभियानों में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।वह भारत की महिला थार मरुस्थल अभियान टीम की सदस्य भी रहीं। इस अभियान के दौरान टीम ने गुजरात के भुज से पंजाब के वाघा बॉर्डर तक लगभग 2,000 किलोमीटर की दूरी महज 30 दिनों में पूरी की।

विनीता सोरेन की कहानी केवल एक पर्वतारोही की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि सफलता के लिए संसाधनों से अधिक जरूरी मजबूत इरादे होते हैं।आज उनकी उपलब्धि देशभर की जनजातीय बेटियों, महिलाओं और युवाओं को बड़े सपने देखने और उन्हें हासिल करने की प्रेरणा देती है।

विनीता की यात्रा यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करतीं। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे पाने का जज्बा मजबूत हो, तो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी भी पहुंच के भीतर होती है।

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