विशेष इन-डेप्थ रिपोर्ट (नई दिल्ली)
संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में लोक कल्याण से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर एक बार फिर प्रखर बहस देखने को मिली। उच्च सदन के सदस्य राघव चड्ढा ने देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पैर पसार रही एक गंभीर और अनैतिक परिपाटी की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने मरीजों के इलाज के दौरान कुछ चिकित्सकों और पैथोलॉजी जांच केंद्रों (डायग्नोस्टिक लैब्स) के बीच जारी अनौपचारिक वित्तीय साठगांठ व ‘कट मनी’ व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाए और इसके तत्काल निवारण हेतु सख्त नियामक तंत्र की वकालत की।
१. चिकित्सा जगत का ‘गुप्त कमीशन मॉडल’ और इसके दुष्प्रभाव
संसद में वक्तव्य देते हुए सांसद ने उजागर किया कि देश के कई हिस्सों में रोगियों को परामर्श देने के बजाय उन्हें किसी विशिष्ट लैब में भेजने के लिए एक समानांतर वित्तीय ढांचा विकसित हो चुका है:
व्यवसाय का कॉर्पोरेट रूप: जांच प्रयोगशालाओं और कुछ चिकित्सकों के बीच निश्चित प्रतिशत तय होता है। लैब खातों में इस रकम को ‘विपणन व्यय’ (Marketing Expense) दर्शाया जाता है, जबकि व्यावहारिक रूप से यह एक अनैतिक ‘रेफरल शुल्क’ होता है।
विदेश दौरों से लेकर प्रत्यक्ष उपहार: इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चिकित्सकों को नकद प्रोत्साहन के अतिरिक्त उपहार और विदेशी पर्यटन पैकेज प्रदान किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
द्वितीय व तृतीय श्रेणी शहरों में प्रसार: यह समस्या विशेष रूप से देश के छोटे शहरों (Tier-2 एवं Tier-3 Cities) में एक असंगठित अर्थव्यवस्था का रूप लेती जा रही है, जिसका सीधा प्रभाव आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
२. आम मरीज के बजट पर बढ़ता अतिरिक्त वित्तीय बोझ
संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, इस अनुचित लेनदेन की वजह से आम नागरिकों के चिकित्सा व्यय में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की जाती है:
मेडिकल बिलों में १५ से २० प्रतिशत का उछाल: शोध रिपोर्टों के संदर्भ से यह रेखांकित किया गया कि जांच केंद्रों द्वारा चिकित्सकों को दिए जाने वाले कमीशन का आर्थिक बोझ स्वयं मरीज के अंतिम बिल में छिपाकर जोड़ दिया जाता है।
अनावश्यक जांच की प्रवृत्ति: अधिक वित्तीय लाभ के लालच में मरीजों को उन पैथोलॉजिकल या रेडियोलॉजिकल टेस्ट्स के लिए भी निर्देशित कर दिया जाता है जिनकी उन्हें चिकित्सकीय आवश्यकता ही नहीं होती। इससे समय और धन दोनों का नुकसान होता है।
३. वैधानिक प्रावधान और नियामक दिशानिर्देश
सदन को अवगत कराया गया कि यह प्रथा न केवल अनैतिक है बल्कि मौजूदा भारतीय कानूनों और चिकित्सा संहिताओं के भी विपरीत है:
MCI एवं NMC के नियम: मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (2002) और तत्पश्चात नेशनल मेडिकल कमीशन (2023) के दिशानिर्देशों में ‘फीस स्प्लिटिंग’ या ‘रेफरल इंसेंटिव’ को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान: नियमानुसार ऐसा करने पर संबंधित चिकित्सक का पंजीकरण एक से तीन महीने तक निलंबित किया जा सकता है। गंभीर या बार-बार उल्लंघन के मामलों में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई का विधान मौजूद है।
४. नागरिकों के लिए सतर्कता संकेतक (Red Flags)
आम जनता को इस प्रकार के अनुचित वित्तीय चक्रव्यूह से बचाने के लिए संसद में कुछ महत्वपूर्ण व्यावहारिक सुझाव भी रखे गए:
विशिष्ट सेंटर के लिए अनुचित दबाव: यदि कोई चिकित्सक मरीज को केवल किसी एक ही विशेष पैथोलॉजी सेंटर से जांच कराने पर जोर दे।
अन्य मान्यता प्राप्त लैब्स की रिपोर्ट खारिज करना: यदि किसी समकक्ष और मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत करने पर चिकित्सक असंतोष या नाराजगी व्यक्त करे।
क्लीनिक में अत्यधिक प्रचार सामग्री: परामर्श कक्ष में किसी विशेष डायग्नोस्टिक चेन का प्रचारत्मक सामान या एजेंटों की बार-बार उपस्थिति दिखाई देना।
५. चिकित्सा समुदाय के प्रति सम्मान और सुधार की अपेक्षा
सदन में यह स्पष्ट किया गया कि यह विषय पूरे चिकित्सा जगत या सभी डॉक्टरों की निष्ठा पर सवाल उठाने के लिए नहीं है। भारत में चिकित्सकों को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है और बहुसंख्यक डॉक्टर पूरी निष्ठा, ईमानदारी और मानवीय संवेदना के साथ रोगियों का उपचार करते हैं। परंतु, प्रणाली में मौजूद कुछ खामियों और काली भेड़ों के कारण पूरे पेशे की साख पर प्रभाव पड़ता है।
निष्कर्ष
स्वास्थ्य सेवाओं को पारदर्शी और सुलभ बनाना किसी भी कल्याणकारी राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्यसभा में उठाए गए इस विषय से यह उम्मीद जगी है कि केंद्र सरकार और नियामक निकाय चिकित्सा परामर्शदाताओं तथा जांच केंद्रों के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम लागू करेंगे, जिससे आम नागरिक अनावश्यक आर्थिक शोषण से सुरक्षित रह सकें।
स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सुधार की मांग: संसद में गूंजा चिकित्सा परामर्शदाताओं और जांच प्रयोगशालाओं की गुप्त साठगांठ का मामला









