Home / राज्य / सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को भेजा कारण बताओ नोटिस, कहा- अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं की जाए

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को भेजा कारण बताओ नोटिस, कहा- अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं की जाए

Spread the love

सीजेपी प्रोटेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरूराजेश चौधरी, नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी नेताओं के प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में वकीलों और पुलिस अधिकारियों के बीच गरमागरम बहस भी हो गई। इस दौरान कपिल सिब्बल सहित सुप्रीम कोर्ट के कई दिग्गज वकीलों ने सरकार और पुलिस के रवैये पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पुलिस पर कानून तोड़ने का भी आरोप लगाया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी दो टूक में मेट्रो, इंटरनेट से लेकर आम जनता की स्वतंत्र आवाजाही पर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने और भी कई सारे निर्देश जारी किए हैं।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और कहा कि हम संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे संक्षिप्त हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। कथित अवमाननाकर्ताओं को नोटिस जारी किया जाए। वे अवमानना याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करें और साथ ही ऊपर उल्लिखित आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करें।

शांतिपूर्ण तरीके से जुटे लोगों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए

सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र हो रहे लोगों को गैरकानूनी रूप से हिरासत में नहीं लेने का भी निर्देश दिया। साथ ही शीर्ष अदालत ने सड़कों पर लगाए गए बैरिकेड्स की आवश्यकता की समीक्षा करने को कहा है।

मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं पर आया सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाओं का संचालन सामान्य रूप से किया जाए और कानून के मुताबिक इंटरनेट सेवाएं निर्बाध बनी रहें। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि लोगों की स्वतंत्र आवाजाही और यातायात की अनुमति दी जाए।

45 मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी क्यों लगी? सुप्रीम कोर्ट ने DMRC से मांगा नक्शा

शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि सिर्फ 45 मेट्रो स्टेशन को रोका गया। ये कुल स्टेशन का 15 फीसदी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप मैप पेश करें कि कौन कौन सा मेट्रो स्टेशन है। लोगों के जनजीवन को कितना प्रभावित किया है।

कपिल सिब्बल बोले- धारा 163 लागू नहीं की जा सकती

कपिल सिब्बल ने कहा कि धारा 163 लागू नहीं की जा सकती। चार किलोमीटर के दायरे के बाहर धारा 163 लागू करने का कोई आधार नहीं है। इस दायरे के बाहर लोगों को हिरासत में नहीं लिया जा सकता, यातायात बाधित नहीं किया जा सकता और बैरिकेड नहीं लगाए जा सकते। मुझे चार किलोमीटर के दायरे के भीतर भी शांतिपूर्वक विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार मिले।

विरोध-प्रदर्शन के लिए एक निर्धारित जगह है। मुझे वहां प्रदर्शन करने का अधिकार है। किसी नागरिक को इसके लिए आवेदन देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि हम इस मुद्दे पर विस्तार से सुनना चाहेंगे।

हम निश्चित रूप से इस पर विचार करना चाहते हैं कि पुलिस की कार्रवाई किस हद तक संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के अनुरूप है। अनुच्छेद 21 का अधिकार भी अपनी संवैधानिक सीमाओं से परे नहीं जाता

ट्रेनों से लोगों को उतारा गया जो कि अदालत की अवमानना: कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि ये सिर्फ कंटेंप्ट का मामला नहीं है बल्कि काफी व्यापक मसला है। कपिल सिब्बल ने कहा कि लोगों को ट्रेनों से उतारा जा रहा है। चार किलोमीटर के दायरे से बाहर के लोगों पर भी पाबंदी है। इसके बाद इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गईं। यह मामला अनुराधा भसीन फैसले के दायरे में आता है। अदालत के आदेशों के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए। यह अवमानना याचिका का भी हिस्सा है।

इसपर जस्टिस जे. बागची ने कहा कि हम जानते हैं कि इन घटनाओं से आप सभी काफी व्यथित हैं। यही वजह है कि आप सभी यहां आए हैं। हम आपकी चिंताओं को तुच्छ या महत्वहीन बताने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

पुलिस अधिकारियों को राज्य से ऊपर कोई व्यक्तिगत अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस जे. बागची ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस अधिकारियों को राज्य से ऊपर कोई व्यक्तिगत अधिकार प्राप्त नहीं है। कृपया माननीय सॉलिसिटर जनरल की सहायता करें। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सभी के लिए समान रूप से संवेदनशील है। हम पहले भी यह कह चुके हैं। चाहे पुलिस अधिकारी हो या आम नागरिक, दोनों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का समान महत्व है।

वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत बोले- कल मेरे साथ बर्बरता की गई

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने दलील देते हुए कहा कि SCAORA (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन) ने याचिका दाखिल की है। कल मेरे साथ भी बर्बरता की गई।

उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ वकीलों तक सीमित नहीं है। वकील होने के नाते हमें कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं। कल शहर में हालात बेहद दमनकारी थे। लोगों को वहां खड़े रहने तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी। मुझे भी उठाकर एक चलती हुई बस में फेंक दिया गया।

यह केवल वकीलों का नहीं, बल्कि नागरिकों के विरोध-प्रदर्शन करने के अधिकार का सवाल है। कल जो स्थिति मैंने देखी, उससे लगा कि हम पुलिस राज की स्थिति से बस एक कदम दूर थे।

मैं अदालत से अनुरोध करता हूं कि राजधानी में नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करने के अधिकार को बहाल किया जाए। कल इस अधिकार को पूरी तरह कुचल दिया गया।

क्या देश में अघोषित आपातकाल है तभी आर्टिकल 19 को सस्पेंड किया गया है

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि आज हम जिस वजह से परेशान हैं, वह केवल यह नहीं है कि राज्य ने अदालत की अवमानना की है। मेट्रो सेवाओं को बाधित करके लोगों की आवाजाही की स्वतंत्रता छीन ली गई। इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गईं। संविधान का अनुच्छेद 358 कहता है कि आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों पर प्रतिबंध लग सकते हैं। क्या राज्य यह कहना चाहता है कि देश में अघोषित आपातकाल लागू है?

Tagged: