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2 मुख्यमंत्रियों की विदेश यात्रा पर सियासी घमासान, CM नायब सैनी को स्वीडन जाने की मंजूरी,CM भगवंत मान पहुंचे हाईकोर्ट

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देश में दो मुख्यमंत्रियों की विदेश यात्रा को लेकर सियासी और कानूनी बहस तेज हो गई है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी सिंगापुर और स्वीडन के दौरे पर हैं, जबकि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को पेरिस जाने के लिए केंद्र सरकार से राजनीतिक मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद पंजाब सरकार ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पंजाब सरकार का आरोप है कि उसके मुख्यमंत्री की यात्रा को मंजूरी नहीं देकर भेदभाव किया गया है। वहीं, केंद्र सरकार ने अदालत में जवाब दाखिल करते हुए कहा कि भगवंत मान को सुरक्षा, प्रोटोकॉल और फ्रांसीसी सरकार की ओर से औपचारिक निमंत्रण की जानकारी नहीं मिलने के कारण अनुमति नहीं दी गई। इस मामले ने केंद्र और पंजाब सरकार के बीच अधिकारों, विदेश यात्राओं की मंजूरी और संघीय व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

नायब सिंह सैनी का सिंगापुर और स्वीडन दौरा, निवेश बढ़ाने पर जोर

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी 4 से 6 अक्टूबर तक सिंगापुर के दौरे पर रहे। इसके बाद 14 अक्टूबर को वे स्वीडन पहुंचे, जहां उनका कार्यक्रम 17 अक्टूबर तक निर्धारित है। इन यात्राओं का उद्देश्य हरियाणा में विदेशी निवेश आकर्षित करना और औद्योगिक साझेदारियों को बढ़ावा देना है। स्वीडन में भारत-स्वीडन नवाचार दिवस के दौरान सैनी ने भारत और स्वीडन के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार 2016 में 2.86 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2025 में 7.75 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। सैनी ने हरियाणा में स्वीडिश निवेश की संभावनाओं पर भी चर्चा की। इनमें गुरुग्राम में आईकेईए की 3,500 करोड़ रुपये की परियोजना, झज्जर के एमईटी सिटी में कार्ल-गुस्ताफ विनिर्माण इकाई और गुरुग्राम में कुनस्कैप्सकोलन स्कूल शामिल हैं। उन्होंने निवेशकों को 2027 में होने वाले हैपनिंग हरियाणा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में शामिल होने का न्योता भी दिया।

भगवंत मान को पेरिस में खाद्य व्यापार मेले में शामिल होना था

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को 15 से 21 अक्टूबर तक पेरिस में पंजाब के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना था। उनके साथ पंजाब के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव रवि भगत भी जाने वाले थे। प्रतिनिधिमंडल को एसआईएलएल पेरिस 2026 खाद्य व्यापार मेले में भाग लेना था, जिसका आयोजन 17 से 21 अक्टूबर तक निर्धारित था। पंजाब की सहकारी विपणन संस्था मार्कफेड को इस आयोजन में इंडिया पवेलियन के तहत 18 वर्ग मीटर का स्टॉल मिला था। राज्य सरकार की याचिका के अनुसार, यात्रा का पूरा खर्च मार्कफेड को उठाना था। कार्यक्रम के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल को व्यापारिक संगठनों और आयातकों के साथ बैठकें करनी थीं। भारतीय राजदूत के साथ भी बैठक प्रस्तावित थी। पंजाब सरकार का कहना है कि इस दौरे का उद्देश्य कृषि उत्पादों और सहकारी संस्थाओं के कारोबार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ावा देना था।

केंद्र ने राजनीतिक मंजूरी देने से किया इनकार, हाईकोर्ट पहुंची पंजाब सरकार

पंजाब सरकार ने 9 सितंबर को विदेश मंत्रालय के ई-पोल क्लीयरेंस पोर्टल पर राजनीतिक मंजूरी के लिए आवेदन किया था। राज्य के सहकारिता विभाग ने इससे पहले 3 और 8 सितंबर को भी विदेश मंत्रालय को पत्र लिखे थे। हालांकि, पोर्टल पर आवेदन की स्थिति अस्वीकृत दिखाई दी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें केवल इतना बताया गया कि प्रस्ताव को राजनीतिक दृष्टिकोण से मंजूरी नहीं दी गई है। पंजाब सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि विदेश मंत्रालय ने न तो कोई अतिरिक्त जानकारी मांगी और न ही अस्वीकृति के विस्तृत कारण बताए। राज्य ने हाईकोर्ट से मंजूरी देने या विदेश मंत्रालय को 24 घंटे के भीतर कारणों सहित नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने की और केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए शुक्रवार तक का समय दिया। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन अदालत में पेश हुए।

पंजाब का आरोप- राजनीतिक मंजूरी के मामले में हो रहा भेदभाव

पंजाब सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि विदेश यात्रा की मंजूरी से जुड़े फैसलों में स्पष्ट कारण होने चाहिए। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक निर्णयों में कारणों का उल्लेख जरूरी है। पंजाब का यह भी कहना है कि राजनीतिक मंजूरी की प्रक्रिया कार्यालयी निर्देशों पर आधारित है, जिनमें स्पष्ट मानदंड, समयसीमा और अपील की व्यवस्था नहीं है। राज्य ने कृषि और सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देना अपने अधिकार क्षेत्र का विषय बताते हुए संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया। पंजाब ने अगस्त 2024 में भगवंत मान की पेरिस यात्रा के लिए मंजूरी नहीं मिलने का मामला भी उठाया। इसके अलावा, याचिका में अन्य नेताओं और जनप्रतिनिधियों की विदेश यात्राओं से जुड़े पुराने मामलों का हवाला देते हुए सवाल किया गया कि अलग-अलग मामलों में मंजूरी देने के मानदंड क्या हैं। पंजाब सरकार का आरोप है कि इस तरह के फैसले संघीय व्यवस्था और राज्यों के अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

केंद्र का जवाब- विदेश यात्रा में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं मुख्यमंत्री

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखा। विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश जाने वाले मंत्री और मुख्यमंत्री भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। विदेशी सरकारें केंद्रीय और राज्य स्तर के प्रतिनिधियों के बीच अलग-अलग व्यवहार नहीं करतीं, इसलिए ऐसी यात्राओं के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन जरूरी है। केंद्र ने बताया कि राजनीतिक मंजूरी की प्रक्रिया कैबिनेट सचिवालय के दिशानिर्देशों पर आधारित है, जिन्हें पहली बार 1982 में जारी किया गया था और 26 अगस्त 2010 को अपडेट किया गया था। वर्ष 2016 से विदेश मंत्रालय का ऑनलाइन पोर्टल इस प्रक्रिया को संभाल रहा है। केंद्र ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में द्विपक्षीय संबंधों से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों के कारण अस्वीकृति के विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते। हलफनामे के मुताबिक, विदेश में मंत्रियों की यात्राएं मेजबान सरकार के औपचारिक निमंत्रण पर होनी चाहिए और फ्रांसीसी सरकार की ओर से ऐसा कोई औपचारिक निमंत्रण विदेश मंत्रालय के संज्ञान में नहीं आया था। हालांकि, पंजाब सरकार का दावा है कि आवेदन के साथ निमंत्रण और कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेज अपलोड किए गए थे।

अब हाईकोर्ट के फैसले पर नजर, केंद्र और पंजाब के बीच बढ़ी तकरार

भगवंत मान की पेरिस यात्रा को मंजूरी नहीं मिलने का मामला अब केवल एक विदेश दौरे तक सीमित नहीं रह गया है। इसके जरिए राज्यों के संवैधानिक अधिकारों, केंद्र की मंजूरी प्रक्रिया और राजनीतिक भेदभाव के आरोपों पर बहस तेज हो गई है। पंजाब सरकार चाहती है कि अदालत अस्वीकृति को रद्द करे या विदेश मंत्रालय को कारणों सहित दोबारा निर्णय लेने का निर्देश दे। वहीं, केंद्र ने सुरक्षा, प्रोटोकॉल और औपचारिक निमंत्रण से संबंधित पहलुओं को अपनी दलील का आधार बनाया है। दूसरी ओर, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की विदेश यात्राओं को लेकर पंजाब सरकार ने तुलना पेश की है। फिलहाल इस विवाद में अंतिम फैसला अदालत की आगे की सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलों पर निर्भर करेगा। यह देखना अहम होगा कि हाईकोर्ट राजनीतिक मंजूरी की प्रक्रिया और उसके कारणों को लेकर क्या रुख अपनाता है।

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