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यूपी चुनाव 2027: अखिलेश यादव का ‘जिताऊ-टिकाऊ’ मंत्र, ब्राह्मणों को साधने के लिए PDA में किया बड़ा बदलाव

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने आगामी चुनाव में सत्ता की वापसी के लिए एक बेहद सधा हुआ और आक्रामक ‘होमवर्क’ तैयार किया है। पार्टी ने टिकट बंटवारे से लेकर सामाजिक समीकरणों तक, हर मोर्चे पर अपनी रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया है।
टिकट का ‘जिताऊ-टिकाऊ’ फॉर्मूला
अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार टिकट केवल सिफारिश या पुरानी वफादारी पर नहीं, बल्कि ‘जनाधार’ और ‘योग्यता’ के आधार पर दिए जाएंगे। सपा की चुनावी रणनीति के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
सर्वे रिपोर्ट कार्ड: पार्टी ने प्रदेश की सभी 403 सीटों के लिए निजी एजेंसियों से सर्वे कराया है। टिकट उसी को मिलेगा, जिसका ‘रिपोर्ट कार्ड’ मजबूत होगा।
जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवार: अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं को ‘जिताऊ और टिकाऊ’ प्रत्याशी चुनने का मंत्र दिया है। यदि कोई कद्दावर नेता भी सर्वे में कमजोर पाया जाता है, तो पार्टी नए और ऊर्जावान चेहरों को मौका देने में संकोच नहीं करेगी।
बूथ स्तर पर तैयारी: केवल टिकट वितरण ही नहीं, बल्कि हर बूथ पर 5% वोट बढ़ाने का लक्ष्य कार्यकर्ताओं को दिया गया है।
PDA में ‘पंडित’ की एंट्री: सोशल इंजीनियरिंग का नया दांव
समाजवादी पार्टी ने अपने पारंपरिक ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण में एक बड़ा बदलाव करते हुए ब्राह्मणों को भी अपने पाले में लाने की कोशिश तेज कर दी है। अखिलेश यादव ने PDA की नई परिभाषा देते हुए कहा है कि ‘P’ का मतलब ‘पिछड़ा’ के साथ-साथ ‘पंडित’ (ब्राह्मण) भी है।
अयोध्या से संदेश: सपा ने अयोध्या विधानसभा सीट से पवन पांडे को उम्मीदवार घोषित कर इस नई रणनीति की औपचारिक शुरुआत कर दी है। राम मंदिर वाली सीट पर ब्राह्मण चेहरे को उतारकर पार्टी ने भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने का स्पष्ट संकेत दिया है।
प्रबुद्ध सम्मेलनों पर जोर: पार्टी राज्य भर में ब्राह्मण सम्मेलन और परशुराम जयंती जैसे कार्यक्रमों के जरिए समाज के प्रबुद्ध वर्ग को जोड़ने का काम कर रही है।
बाहरी सलाहकारों से किनारा, जमीनी फीडबैक पर भरोसा
2027 की तैयारी के लिए सपा ने एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव भी किया है। पार्टी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की संस्था I-PAC के साथ अपना करार खत्म कर लिया है। अब अखिलेश यादव बाहरी सलाहकारों के बजाय स्थानीय जिला स्तरीय नेताओं और जमीनी फीडबैक पर अधिक भरोसा जता रहे हैं।
निष्कर्ष: अखिलेश यादव का लक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली सफलता को 2027 में दोहराना है। पीडीए के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर एक विशाल ‘सर्वजन’ गठबंधन बनाने की यह कवायद यूपी की सियासत में भाजपा के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है। अब देखना यह है कि यह नया सियासी फॉर्मूला जमीन पर कितना असर दिखाता है।