देहरादून/नई दिल्ली।
गाँव से शहर तक (फीचर डेस्क)
पहाड़ों की संस्कृति, लोकजीवन और परंपराओं को लंबे समय से संजोए हुए गढ़वाली सिनेमा ने आखिरकार वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसका इंतजार वर्षों से किया जा रहा था। गढ़वाली फीचर फिल्म ‘ढोली’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फीचर फिल्म (रजत कमल) से सम्मानित किया गया है। यह उपलब्धि केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि उत्तराखंड की भाषा, लोककला और सांस्कृतिक विरासत के राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान का प्रतीक है।
‘ढोली’ का निर्देशन दिनेश पी. भोंसले ने किया है, जबकि इसकी कहानी वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर हटवाल ने लिखी है। फिल्म की शूटिंग उत्तरकाशी जिले के ग्रामीण अंचलों में की गई, जहां की प्राकृतिक सुंदरता और स्थानीय परिवेश फिल्म को वास्तविकता के बेहद करीब ले जाते हैं।
एक समुदाय की अनकही कहानी
फिल्म का केंद्र एक ऐसे पारंपरिक ढोली (औजी) परिवार का जीवन है, जिसकी पहचान सदियों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी रही है। विवाह, धार्मिक अनुष्ठान, लोकपर्व और सामाजिक आयोजनों में ढोल-दमाऊ की गूंज केवल संगीत नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक आत्मा मानी जाती है।
बदलते समय के साथ आधुनिक जीवनशैली और बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने इस पारंपरिक कला से जुड़े लोगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। फिल्म इन्हीं बदलावों के बीच सम्मान, पहचान और अस्तित्व की तलाश कर रहे कलाकारों की संवेदनशील कहानी प्रस्तुत करती है।
लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज
‘ढोली’ की सबसे बड़ी ताकत इसका सांस्कृतिक पक्ष है। फिल्म में उत्तराखंड की लोकभाषा, पारंपरिक वेशभूषा, रीति-रिवाज, लोकगीत और विशेष रूप से ढोल-दमाऊ की धुनों को स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि यह फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को समझने का एक माध्यम भी बनती है।
गढ़वाली फिल्मों के लिए नई उम्मीद
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में मिली यह सफलता गढ़वाली फिल्म उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। लंबे समय से सीमित संसाधनों में काम कर रहे क्षेत्रीय फिल्मकारों को इससे नई प्रेरणा मिलेगी। साथ ही यह उपलब्धि युवा फिल्म निर्माताओं को अपनी मिट्टी, भाषा और लोककथाओं पर आधारित सिनेमा बनाने के लिए भी प्रोत्साहित करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को यदि मजबूत कहानी और सांस्कृतिक गहराई के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।
प्रदेश के लिए गर्व का विषय
राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद उत्तराखंड में एक अलग ही खुशी का माहौल है। इसे प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर और लोकभाषा के सम्मान के रूप में देखा जा रहा है। यह उपलब्धि उन कलाकारों, लेखकों और तकनीशियनों के वर्षों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद गढ़वाली सिनेमा को जीवित रखा।
‘ढोली’ की सफलता यह संदेश भी देती है कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और लोकसंस्कृतियों में ऐसी अनेक कहानियां हैं, जो राष्ट्रीय मंच पर अपनी अलग पहचान बनाने की क्षमता रखती हैं। उत्तराखंड के लिए यह सम्मान केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने का अवसर भी है।









