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मातृस्नेह और संतान की लंबी उम्र की पावन आस्था: जानिए आज हल षष्ठी (बलदेव छठ) का महात्म्य, व्रत कथा और पूजा विधान

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नई दिल्ली:
आज यानी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि (2 सितंबर 2026) को देशभर में हल षष्ठी (जिसे ललही छठ, हरछठ या बृज क्षेत्र में बलदेव छठ भी कहा जाता है) का पावन पर्व बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उनकी रक्षा के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठिन और फलदायी निर्जला व्रत है।
भगवान बलराम के जन्मोत्सव से जुड़ी है यह तिथि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी (बलदेव) का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य अस्त्र ‘हल’ (Plough) और ‘मूसल’ है। कृषि संस्कृति और अन्न की सुरक्षा के प्रतीक हलधर (बलराम जी) के सम्मान में ही इस तिथि को ‘हल षष्ठी’ या ‘हरछठ’ नाम से जाना जाता है।
हल षष्ठी की प्रामाणिक व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक गर्भवती ग्वालिन (दूध बेचने वाली) से जुड़ी कथा इस व्रत के महात्म्य को दर्शाती है:
एक बार एक ग्वालिन प्रसव का समय निकट होने के बावजूद दूध और दही बेचने शहर जा रही थी। रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा हुई और उसने एक महुए के पेड़ के नीचे एक सुंदर बालक को जन्म दिया। ग्वालिन व्यवसाय के मोह में नवजात शिशु को वहीं महुए की छाया में छोड़कर दूध बेचने चली गई।
उस दिन हल षष्ठी (हरछठ) का व्रत था। रास्ते में एक किसान खेत में हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क गए और हल की नोक (फाल) से झाड़ी में लेटा हुआ बालक गंभीर रूप से घायल हो गया। किसान भयभीत होकर वहां से चला गया। जब ग्वालिन लौटकर आई, तो अपने लहूलुहान बच्चे को देखकर वह फफक कर रो पड़ी। उसे तुरंत अहसास हुआ कि उसने दूध में मिलावट करके और व्रत के नियमों की अनदेखी करके बड़ा पाप किया है।
ग्वालिन ने वहीं रोते हुए ईश्वर से अपने पाप की क्षमा मांगी और अपने पुत्र की रक्षा के लिए सच्ची श्रद्धा से प्रार्थना की। उसके पश्चाताप और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान बलराम की कृपा हुई और वह बालक पूरी तरह से सुरक्षित व जीवित हो उठा। तभी से माताएं संतान की हर विपत्ति से रक्षा के लिए हल षष्ठी का व्रत नियमपूर्वक रखती हैं।
व्रत की अनूठी मान्यताएं और नियम
हल षष्ठी के व्रत में खान-पान और पूजन विधि को लेकर बेहद कड़े और विशिष्ट नियम हैं:
हल से जुते अनाज का त्याग: इस दिन खेत में हल से जोतकर उगाए गए किसी भी अनाज या फल-सब्जी (जैसे गेहूं, चावल आदि) का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है।
पसई का चावल और महुआ: व्रत रखने वाली महिलाएं केवल बिना जुताई वाले खेत या तालाब किनारे स्वयं उगने वाले ‘पसई के चावल’ (तिन्नी का चावल) और महुए का ही सेवन करती हैं।
भैंस का दूध और घी: इस दिन गाय के दूध, दही या घी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग पूजा और फलाहार में किया जाता है।
झरबेरी और कांही की पूजा: घर के आंगन या पूजा स्थल पर महुए की डाल, झरबेरी (कांटेदार झाड़ी) और तालाब की मिट्टी से छोटा कुंड बनाकर पूजा की जाती है, जहां माताएं अपनी संतान की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।