बाड़मेर (राजस्थान):
“न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर होती है”—यह कहावत आज राजस्थान के बाड़मेर जिले में चरितार्थ होती दिख रही है। जमीन पर अवैध कब्जे और दबंगई के खिलाफ एक लाचार पिता पिछले 54 दिनों से खुले आसमान के नीचे, एक साधारण तिरपाल के सहारे शांत धरने पर बैठने को मजबूर है। न कोई भीड़, न मीडिया की चकाचौंध और न ही किसी राजनीतिक दल का समर्थन; इसके बावजूद अंबाराम मेघवाल अपने मासूम बेटे के साथ मिलकर केवल कानून और प्रशासन से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
पूरा मामला: पुश्तैनी जमीन और दबंगों का अवैध कब्जा
पीड़ित अंबाराम मेघवाल के अनुसार, उनकी पुश्तैनी जमीन पर स्थानीय दबंगों द्वारा अवैध रूप से कब्जा करने और उन्हें अपनी ही संपत्ति से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है।
अंबाराम का आरोप है कि उन्होंने अपनी जमीन बचाने और न्याय पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के अनगिनत चक्कर काटे। स्थानीय पुलिस थाने से लेकर तहसील कार्यालय और जिला कलेक्ट्रेट तक, हर चौखट पर उन्होंने अपनी फरियाद रखी। लेकिन हर बार उन्हें केवल जांच के आश्वासन देकर टाल दिया गया। जब प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस और ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो हताश होकर उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपनाया।
सरकारी और प्रशासनिक कार्रवाई की वर्तमान स्थिति
54 दिन बीत जाने के बाद भी मामले में प्रशासनिक स्तर पर कोई बड़ी या प्रभावी कार्रवाई देखने को नहीं मिली है:
अधिकारियों की ढिलाई: पीड़ित का कहना है कि बार-बार शिकायती पत्र देने के बावजूद राजस्व विभाग द्वारा जमीन के सीमांकन (पैमाइश) की प्रक्रिया को लगातार टाला जा रहा है।
पुलिस और राजस्व विभाग का रुख: स्थानीय स्तर पर पुलिस और राजस्व अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी के कारण दबंगों के हौसले बुलंद हैं, जबकि पीड़ित परिवार को लगातार मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।
जनप्रतिनिधियों और सरकार की चुप्पी: 54 दिनों से चल रहे इस शांतिपूर्ण धरने के बावजूद किसी वरिष्ठ अधिकारी या स्थानीय जनप्रतिनिधि ने मौके पर पहुंचकर पीड़ित का हाल जानना तक उचित नहीं समझा, जिससे शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों में आक्रोश और उठती मांगें
अंबाराम मेघवाल का यह संघर्ष अब केवल एक व्यक्तिगत जमीन का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था और आम नागरिक के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और समर्थकों की मांग है कि:
तत्काल सीमांकन और बेदखली: राजस्व विभाग तुरंत टीम गठित कर जमीन का निष्पक्ष सीमांकन करे और अवैध कब्जाधारियों को वहां से हटाए।
लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई: पीड़ित को महीनों तक धरने पर बैठने के लिए मजबूर करने वाले और सुनवाई न करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
सुरक्षा और मुआवजा: पीड़ित परिवार को दबंगों से सुरक्षा प्रदान की जाए और इतने दिनों की प्रताड़ना के लिए उचित न्याय मिले।
निष्कर्ष
अंबाराम और उनके बेटे की यह खामोश जंग हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर एक बड़ा आईना है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी गरीब और असहाय नागरिक को अपनी ही जमीन का हक पाने के लिए महीनों तक सड़कों पर बैठना पड़ेगा? जब तक जिम्मेदार अधिकारी नींद से नहीं जागते, तब तक अंबाराम मेघवाल का यह शांतिपूर्ण सत्याग्रह जारी रहेगा।
बाड़मेर: 54 दिनों से तिरपाल तले न्याय की गुहार लगा रहा पीड़ित पिता, जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में सरकारी उदासीनता पर उठे गंभीर सवाल









