रिपोर्ट: वर्षा चमोली
नई दिल्ली 15 July
हर दिन करोड़ों भारतीय अपनी थाली में परोसे गए फल, सब्जियां, अनाज और दालों को इस भरोसे के साथ खाते हैं कि उनका भोजन सुरक्षित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों (Pesticides) और रासायनिक अवशेषों (Chemical Residues) को लेकर लोगों की चिंता बढ़ी है। सोशल मीडिया से लेकर वैज्ञानिक मंचों तक यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या हमारी खेती जरूरत से ज्यादा रसायनों पर निर्भर हो गई है?
हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि हर रसायन हानिकारक नहीं होता। समस्या तब पैदा होती है जब कीटनाशकों का गलत समय पर, गलत मात्रा में या वैज्ञानिक सलाह के बिना उपयोग किया जाता है।
आखिर कीटनाशक क्यों इस्तेमाल किए जाते हैं?
भारत एक कृषि प्रधान देश है। बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन करना बड़ी चुनौती है। हर साल फसलों को कीट, फफूंद, वायरस और खरपतवार से भारी नुकसान होता है। इन्हीं नुकसान को कम करने के लिए किसान कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों का उपयोग करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि वैज्ञानिक तरीके से इनका उपयोग किया जाए तो फसल उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय सुरक्षित रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
समस्या कहाँ से शुरू होती है?
समस्या तब होती है जब—
- अनुशंसित मात्रा से अधिक दवा का छिड़काव किया जाता है।
- एक ही दवा का बार-बार उपयोग किया जाता है।
- कटाई से ठीक पहले कीटनाशक का प्रयोग कर दिया जाता है।
- किसान सुरक्षा निर्देशों और ‘वेटिंग पीरियड’ का पालन नहीं करते।
ऐसी स्थिति में फलों, सब्जियों और अनाज में कीटनाशकों के अवशेष रह सकते हैं।
क्या इसका असर स्वास्थ्य पर पड़ सकता है?
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार लंबे समय तक अत्यधिक मात्रा में कुछ कीटनाशकों के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। इनमें तंत्रिका तंत्र, हार्मोन, लीवर और किडनी पर प्रभाव जैसे विषयों पर अध्ययन हुए हैं। हालांकि इसका प्रभाव रसायन के प्रकार, मात्रा और संपर्क की अवधि पर निर्भर करता है।
इसी कारण भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) विभिन्न खाद्य पदार्थों के लिए Maximum Residue Limit (MRL) निर्धारित करता है। यदि किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष तय सीमा से अधिक पाए जाते हैं, तो नियामक कार्रवाई की जा सकती है।
क्या कहती है FSSAI की रिपोर्ट?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) देशभर में फल, सब्ज़ियों, अनाज, दालों, मसालों और अन्य खाद्य पदार्थों के नमूनों की नियमित जाँच करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनमें कीटनाशकों के अवशेष निर्धारित सीमा (Maximum Residue Limit-MRL) के भीतर हैं।
संसद में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, 2022 से 2025 के बीच देशभर से 86,401 खाद्य नमूनों की कीटनाशक अवशेषों के लिए जाँच की गई। इनमें से लगभग 2.8 प्रतिशत नमूनों में MRL से अधिक कीटनाशक अवशेष पाए गए, जबकि अधिकांश नमूने निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप थे।
FSSAI का कहना है कि MRL किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष की वह अधिकतम स्वीकार्य सीमा है, जिसे वैज्ञानिक Risk Assessment के आधार पर तय किया जाता है। यदि किसी नमूने में यह सीमा पार पाई जाती है, तो संबंधित एजेंसियाँ आवश्यक कार्रवाई करती हैं।
हाल के वर्षों में FSSAI ने कीटनाशक अवशेषों की निगरानी को और सुदृढ़ करने, प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने तथा किसानों और अन्य हितधारकों के साथ जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने पर भी विशेष जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित खेती के लिए केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि किसानों को सही मात्रा, सही समय और सुरक्षित उपयोग के बारे में निरंतर प्रशिक्षण देना भी उतना ही आवश्यक है।
MRL क्या है?
MRL (Maximum Residue Limit) किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष की वह अधिकतम सीमा है जिसे वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर सुरक्षित माना जाता है। यदि किसी खाद्य पदार्थ में यह सीमा अधिक पाई जाती है तो संबंधित एजेंसियाँ जांच और आवश्यक कार्रवाई करती हैं।
क्या किसान जानबूझकर ऐसा करते हैं?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश किसान अधिक उत्पादन और फसल बचाने के उद्देश्य से रसायनों का उपयोग करते हैं। कई बार उन्हें सही मात्रा, सही समय या सुरक्षित उपयोग की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। मौसम, कीटों का बढ़ता दबाव और बाज़ार की प्रतिस्पर्धा भी इस स्थिति को प्रभावित करती है।
सरकारी एजेंसियों की भूमिका
भारत सरकार, कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न सार्वजनिक उपक्रम समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण देते हैं।
HIL (India) Limited जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ भी फसल सुरक्षा उत्पादों के साथ सुरक्षित उपयोग और जागरूकता कार्यक्रमों पर काम करती हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान सही सलाह के अनुसार उत्पादों का उपयोग करें, तो जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है।
क्या जैविक खेती ही एकमात्र समाधान है?
कई लोग मानते हैं कि केवल जैविक खेती ही समाधान है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विशाल देश में सभी फसलों को तुरंत पूरी तरह जैविक प्रणाली में बदलना व्यावहारिक नहीं है।
इसके बजाय कई वैज्ञानिक Integrated Pest Management (IPM) यानी समेकित कीट प्रबंधन की सलाह देते हैं। इसमें रासायनिक दवाओं के साथ जैविक उपाय, प्राकृतिक शत्रुओं का उपयोग और वैज्ञानिक निगरानी शामिल होती है। इससे रसायनों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
उपभोक्ता क्या कर सकते हैं?
विशेषज्ञ निम्न सावधानियाँ अपनाने की सलाह देते हैं
- फल और सब्जियों को बहते पानी से अच्छी तरह धोएँ।
- मौसमी फल और सब्जियों को प्राथमिकता दें।
- विविध प्रकार का भोजन करें।
- विश्वसनीय स्रोतों से खाद्य सामग्री खरीदें।
- अफवाहों के बजाय वैज्ञानिक जानकारी पर भरोसा करें।
आगे की राह
भारत को एक साथ दो चुनौतियों का सामना करना है एक ओर बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन और दूसरी ओर सुरक्षित भोजन सुनिश्चित करना।
इसके लिए आवश्यक है कि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार कीटनाशकों का उपयोग करें, कंपनियाँ सुरक्षित और प्रभावी उत्पाद विकसित करें, सरकारी एजेंसियाँ निगरानी और प्रशिक्षण को मजबूत करें तथा उपभोक्ता भी जागरूक रहें।
सुरक्षित खेती और सुरक्षित भोजन किसी एक किसान, कंपनी या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
स्रोत: संसद में उपलब्ध कराई गई जानकारी, FSSAI के दिशा-निर्देश एवं खाद्य सुरक्षा संबंधी आधिकारिक दस्तावेज़।









