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बिहार दिवस पर गर्व और पहचान की नई परिभाषा

बिहार दिवस के अवसर पर Chirag Paswan
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“हाँ, मैं बिहारी हूँ”: बिहार दिवस पर गर्व का संदेश

By: Varsha Chamoli

GSST / दिल्ली: केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग़ पासवान ने रविवार को बिहार दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में बिहार की पहचान, भाषा और संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी जड़ों, अपनी भाषा और अपनी पहचान पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि अलग-अलग बोलियाँ, उच्चारण और जीवनशैली ही भारत की असली खूबसूरती हैं।

चिराग पासवान ने एक कार्यक्रम के दौरान उपस्थितों को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमे अपनी बिहारी भाषा से प्यार करना चाहिए, हम “श” को “स” बोलते हैं तो हमें इस पर भी गर्व होना चाहिए।
यही हमारे देश की खूबसूरती है। अनेक प्रकार की बोली है , रहने का अलग अलग तरीका है और यह हमे अलग पहचान देती है।
चिराग ने उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि आप गर्व करिए आप बिहार से है आप बिहारी है ।

इस संदेश ने लोगों को अपनी जड़ों की ओर देखने और अपनी पहचान को नए नज़रिए से समझने के लिए प्रेरित किया।

पहचान की कहानी: “बोझ या गर्व?”

इसी संदर्भ में एक कहानी याद आती है—रवि की कहानी।

पटना के पास एक छोटे से गाँव में जन्मा रवि बचपन से ही तेज़ और महत्वाकांक्षी था। घर में भोजपुरी बोली जाती थी, और उसकी माँ हमेशा उसे अपनी मिट्टी और भाषा से जुड़े रहने की सीख देती थी।

समय के साथ रवि पढ़ाई के लिए मुंबई चला गया। वहां की आधुनिक जीवनशैली और तेज़ रफ्तार ने उसे बदलना शुरू कर दिया। जब कॉलेज में उससे पूछा गया, “तुम कहाँ से हो?” तो उसने झिझकते हुए जवाब दिया, “नॉर्थ इंडिया से…”, और जानबूझकर “बिहार” शब्द से बच गया।

धीरे-धीरे रवि ने अपनी पहचान छुपानी शुरू कर दी। उसे डर था कि लोग उसे “बिहारी” कहकर आंकेंगे या मज़ाक उड़ाएंगे। उसने भोजपुरी बोलना छोड़ दिया और खुद को पूरी तरह हिंदी और अंग्रेज़ी तक सीमित कर लिया।

फिर एक दिन उसके ऑफिस में सुरेश नाम का एक नया कर्मचारी आया—जो बिहार से ही था, लेकिन रवि से बिल्कुल अलग। सुरेश खुलकर कहता, “हाँ, मैं बिहारी हूँ,” और अपनी भाषा में भी बेझिझक बात करता।

ऑफिस में कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाते, लेकिन वह मुस्कुराकर कहता,
“जिस मिट्टी ने मुझे बनाया, उससे शर्म कैसी?”

यह बात रवि के दिल को छू गई।

जब रवि ने उससे पूछा कि क्या उसे बुरा नहीं लगता, तो सुरेश ने जवाब दिया,
“बुरा तब लगे जब मैं खुद अपनी पहचान से भागूं। अगर मैं खुद ही शर्मिंदा हो जाऊं, तो दुनिया क्यों सम्मान करेगी?”

उस रात रवि देर तक सोचता रहा। उसे अपना गाँव, माँ की बातें और बचपन की यादें आने लगीं। उसे एहसास हुआ कि समस्या “बिहारी होना” नहीं, बल्कि उसका अपना डर और समाज की गलत धारणाएं थीं।

अगले दिन, जब ऑफिस में फिर वही सवाल पूछा गया—“आप कहाँ से हैं?”
इस बार रवि ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा,
“मैं बिहार से हूँ… और मुझे इस पर गर्व है।”

सांस्कृतिक समृद्धि: बिहार की पहचान

बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यहाँ की भाषा, खान-पान और कला देशभर में अपनी अलग पहचान रखते हैं।
• सत्तू: प्रोटीन से भरपूर यह पारंपरिक खाद्य आज भी स्वास्थ्य और स्वाद का बेहतरीन उदाहरण है। इससे लिट्टी, पराठे और कई अन्य व्यंजन बनाए जाते हैं।
• लिट्टी-चोखा: बिहार का यह लोकप्रिय व्यंजन अब पूरे भारत में पसंद किया जाता है।
• मिथिला पेंटिंग: अपनी बारीक कलाकारी और पारंपरिक शैली के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
• भोजपुरी और मैथिली भाषा: ये सिर्फ भाषाएं नहीं, बल्कि भावनाओं और संस्कृति की पहचान हैंl

यह कहानी और संदेश हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाते हैं—

पहचान छुपाने से सम्मान नहीं मिलता, बल्कि उसे अपनाने से मिलता है।

आज के दौर में, जब लोग अक्सर अपनी जड़ों से दूर जाने की कोशिश करते हैं, ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपनी पहचान को बोझ नहीं, बल्कि गर्व के रूप में देखें।

बिहारी होना सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि मेहनत, संघर्ष, प्रतिभा और संस्कृति का प्रतीक है।

इसलिए, अगर आप बिहार से हैं—तो मुस्कुराइए, गर्व से कहिए:
“हाँ, मैं बिहारी हूँ।”

बिहार दिवस का इतिहास

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