नई दिल्ली:
नेपाल के ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में हिमनद झील टूटने (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड – GLOF) के कारण आई अचानक और भयानक बाढ़ ने भारतीय सुरक्षा व आपदा तंत्र की नींद उड़ा दी है। पड़ोसी देश में घटे इस प्राकृतिक हादसे ने भारतीय सीमा के भीतर मौजूद संवेदनशील जल स्रोतों को लेकर बड़ी चेतावनी जारी कर दी है। भारतीय भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में मौजूद करीब 200 बर्फीली झीलें इस समय बेहद नाजुक स्थिति में हैं और कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं।
7,500 बर्फीले जलाशयों का नेटवर्क और बढ़ता जोखिम
ताजा सरकारी आंकड़ों और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार, समूचे हिमालयी क्षेत्र में लगभग 7,500 ग्लेशियल झीलें फैली हुई हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से लगभग 4,700 झीलें सीधे तौर पर गंगा नदी के कैचमेंट एरिया में स्थित हैं, जो 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक विशाल क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। यदि इनमें से किसी भी मुख्य झील का प्राकृतिक बांध क्षतिग्रस्त होता है, तो निचले मैदानी इलाकों में भारी तबाही आ सकती है। अकेले सिक्किम राज्य में ही इन झीलों का 10 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जिनमें से 25 झीलों को ‘अति-संवेदनशील’ (हाई-रिस्क) कैटेगरी में वर्गीकृत किया गया है।
क्लाइमेट चेंज और ‘चेन रिएक्शन’ का घातक कॉम्बिनेशन
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। जब बड़े बर्फीले पहाड़ या चट्टानों के टुकड़े इन झीलों में गिरते हैं, तो पानी का दबाव अचानक बढ़ जाता है और प्राकृतिक बांध टूट जाते हैं। आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के मुताबिक यह एक ‘चेन रिएक्शन’ की तरह काम करता है, जिसमें मलबा, पानी और बर्फ मिलकर कुछ ही मिनटों में विकराल रूप ले लेते हैं। इससे निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थान पर जाने का वक्त तक नहीं मिल पाता।
सिक्किम हादसे से सबक और केंद्र की विशेष तैयारी
भारत पहले भी सिक्किम की ल्होनक झील फटने की त्रासदी झेल चुका है, जिसमें 20 मीटर ऊंची विनाशकारी लहरों ने कई जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया था। इस घटना के बाद केंद्र सरकार ने उच्च स्तरीय समन्वय समिति का गठन किया था। राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत सरकार ने लगभग 195 से 200 अति-संवेदनशील झीलों की पहचान की है और चार प्रमुख हिमालयी राज्यों के लिए 150 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है।
24 घंटे सैटेलाइट ट्रैकिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर जोर
वर्तमान में एनडीएमए (NDMA), केंद्रीय जल आयोग, सेना और आईटीबीपी के वैज्ञानिक इन खतरनाक झीलों की सैटेलाइट तकनीक से चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब सिर्फ अलर्ट जारी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि मैदानी इलाकों में अर्ली वार्निंग सेंसर लगाने, इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा मजबूत करने और स्थानीय समुदायों को जागरूक करने का काम युद्ध स्तर पर करना होगा।
हिमालय में ‘जल बम’ की दस्तक: नेपाल में फटी ग्लेशियल झील तो भारत में बजा रेड अलर्ट, 200 जलाशयों पर मंडराया महाविनाश का खतरा









