नई दिल्ली:
सनातन धर्म में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है। “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय” का भाव समेटे भारत का सबसे पवित्र पर्व गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को पूरे देश में अपार श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आलौकिक पर्व की शुरुआत कैसे हुई? आखिर क्यों इसे केवल एक त्योहार नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा माना जाता है?
आइए, जानते हैं गुरु पूर्णिमा का संपूर्ण इतिहास, पौराणिक कथा और इसके पीछे का पूरा रहस्य।
📜 कब और कैसे हुई गुरु पूर्णिमा की शुरुआत? (पौराणिक इतिहास)
गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। धार्मिक ग्रंथों और वैदिक मान्यताओं के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत महर्षि वेदव्यास जी के जन्म दिवस से हुई थी।
वेदव्यास जी का प्राकट्य: द्वापर युग में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के अंशावतार महर्षि वेदव्यास जी (कृष्णद्वैपायन) का जन्म हुआ था।
वेदों का विभाजन: महर्षि व्यास ही वे महापुरुष थे जिन्होंने मानव कल्याण के लिए अपौरुषेय वेदों का संकलन किया और उन्हें चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया। इसी कारण उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा।
पुराणों और महाभारत की रचना: उन्होंने 18 पुराणों, श्रीमद्भागवत और महाकाव्य ‘महाभारत’ की रचना भी की।
जब महर्षि व्यास ने अपने शिष्यों को संपूर्ण वेदों और शास्त्रों का ज्ञान पूर्ण कर दिया, तब शिष्यों ने परम पूज्य गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनके चरण पूजे और उन्हें वस्त्र, फल व दक्षिणा अर्पित की। उसी दिन से ‘व्यास पूर्णिमा’ या ‘गुरु पूर्णिमा’ की परंपरा का शुभारंभ हुआ।
🕉️ प्रथम गुरु का प्रसंग: भगवान शिव और प्रथम शिष्य
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, गुरु पूर्णिमा का संबंध भगवान शिव (आदिगुरु) से भी जुड़ा है:
आदिगुरु शिव और सप्तऋषि:
माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ‘आदिगुरु’ बने थे। उन्होंने हिमालय पर कांति सरोवर के तट पर अपने प्रथम सात शिष्यों (सप्तऋषियों) को योग, तंत्र और परम ज्ञान का उपदेश दिया था। शिव जी द्वारा दिए गए इस ज्ञान ने ही पूरी मानव सभ्यता को दिशा दिखाई।
💡 क्यों मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का पर्व?
अज्ञान के अंधकार से मुक्ति: संस्कृत शब्द ‘गु’ का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ है उसे दूर करने वाला (प्रकाश)। जो हमें अज्ञानता के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए, वही गुरु है।
कृतज्ञता ज्ञापन: यह दिन जीवन में सही मार्ग दिखाने वाले गुरुओं, आचार्यों, माता-पिता और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने का अवसर है।
विद्यारंभ और दीक्षा: सनातन परंपरा में इस दिन नए गुरु बनाने, दीक्षा लेने और विद्या अध्ययन की शुरुआत करने का विशेष विधान है।
🪔 आधुनिक काल में गुरु पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?
आज के समय में भी गुरु पूर्णिमा की भव्यता और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है:
गुरु पूजन: शिष्य तड़के स्नान कर अपने गुरु के आश्रम या घर जाकर उनके चरणों की धूल माथे से लगाते हैं, चरण वंदना करते हैं और वस्त्र, फल व गुरु दक्षिणा भेंट करते हैं।
व्यास पूजन: जो लोग अपने गुरु के पास नहीं जा पाते, वे महर्षि वेदव्यास जी के चित्र या मूर्ति की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
दान-पुण्य और अखंड पाठ: आश्रमों और मंदिरों में इस दिन गीता पाठ, गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ, भजन-कीर्तन और विशाल भंडारों का आयोजन किया जाता है।
📌 निष्कर्ष: गुरु बिना ज्ञान नहीं
गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह गुरु-शिष्य के उस पावन संबंध का उत्सव है जो व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया से उबारकर मोक्ष की ओर ले जाता है। इस पावन अवसर पर अपने गुरुओं का स्मरण करें और उनके दिखाए सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
“गुरु बिन होय न ज्ञान”: आषाढ़ पूर्णिमा को क्यों कहा जाता है व्यास पूर्णिमा? पढ़ें सनातन धर्म के सबसे पवित्र पर्व की पूरी पौराणिक कथा और उत्पत्ति का इतिहास!









