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हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर भू-राजनीतिक तनाव: डोनाल्ड ट्रंप के नक्शे वाले दावे पर ईरान का करारा पलटवार

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पश्चिम एशिया और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद संवेदनशील ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को लेकर एक बार फिर वाशिंगटन और तेहरान के बीच राजनयिक तल्खी चरम पर पहुंच गई है। [अनिल Anadolu Ajansı और The Guardian के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य के क्षेत्र को रेखांकित करते हुए एक नक्शा साझा किया, जिसके साथ उन्होंने इसे ‘नया अमेरिकी क्षेत्र’ (NEW U.S. Territory) घोषित करने का दावा किया]।
ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी नौसेना के प्रभावी जहाजरानी नाकेबंदी (Naval Blockade) के कारण इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर उनका व्यावहारिक नियंत्रण कायम हो चुका है। हालांकि, उनके इस बयान और नक्शे के सार्वजनिक होने के बाद वैश्विक मीडिया और राजनयिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
ईरान का पलटवार और रणनीतिक तंज
डोनाल्ड ट्रंप के इस नक्शे और संप्रभुता संबंधी दावे पर तेहरान की ओर से त्वरित और सख्त प्रतिक्रिया आई है। ईरान के विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बयान को अमेरिका का “भ्रम” करार दिया।
राजनयिक तंज: ईरानी अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका के स्वामित्व का दावा हकीकत से कोसों दूर है।
कैलिफोर्निया पर प्रतीकात्मक जवाब: ईरानी मीडिया हैंडल्स ने अमेरिका के नक्शे में कैलिफोर्निया राज्य को हाइलाइट करते हुए मजाकिया अंदाज में उसे “ईरान का नया क्षेत्र” बताकर वाशिंगटन के दावों का कड़ा विरोध दर्ज कराया।
जलमार्ग की स्थिति: तेहरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक वाशिंगटन अपनी नीतियां नहीं बदलता और द्विपक्षीय समझौतों का पालन नहीं करता, तब तक इस जलमार्ग के प्रयोग को लेकर उसका सख्त रुख बरकरार रहेगा।
ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नौवहन पर असर
दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का एक-पांचवां हिस्सा हॉर्मुज की संकरी जलधारा से होकर गुजरता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ रहे इस तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों, कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियों के बीच अनिश्चितता बढ़ा दी है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयानों से जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर चल रही बहुपक्षीय वार्ताओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जहां अमेरिकी प्रशासन इसे सैन्य दबाव और आर्थिक रणनीति के रूप में पेश कर रहा है, वहीं ईरान इसे अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता पर हमला मानकर कड़ा रुख अपनाए हुए है।