धर्मेंद्र तिवारी से बातचीत में सामने आई उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और बदलते समय के बीच अपनी जड़ों को बचाने की|
वर्षा चमोली।गाँव से शहर तक
कई बार किसी व्यक्ति से मुलाकात कुछ मिनटों या कुछ घंटों की होती है, लेकिन उस मुलाकात में हुई बातचीत लंबे समय तक मन में चलती रहती है। कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें केवल सुनकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए, बल्कि इनके बारे में लिखा जाना चाहिए, लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए और शायद समाज के बीच एक नई चर्चा भी शुरू की जानी चाहिए।
धर्मेंद्र तिवारी जी से हुई बातचीत मेरे लिए ऐसी ही मुलाकात रही।
भारत सरकार के रेल मंत्रालय में अपर महानिदेशक (जनसंपर्क) जैसे महत्वपूर्ण दायित्व से जुड़े तिवारी जी से बातचीत स्वाभाविक रूप से कई विषयों पर हुई। लेकिन जब बात उत्तराखंड की मिट्टी, पहाड़ के गांवों, लोकगीतों, पुराने संस्कारों और उन परंपराओं तक पहुंची, जिन्हें हमारे बुजुर्गों ने अपने जीवन में जिया है, तो बातचीत का स्वर ही बदल गया।
यह सिर्फ संस्कृति की बात नहीं रह गई थी।
यह सवाल बन गया था कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं?
हम उन्हें आधुनिक दुनिया दे रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन क्या हम उन्हें अपनी जड़ों की कहानी भी दे रहे हैं?
यही सवाल इस पूरी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा लगा।
तरक्की जरूरी है, लेकिन अपनी पहचान भी जरूरी है
आज का समय बहुत तेजी से बदल रहा है।
गांवों से शहरों की ओर लोगों का आना बढ़ा है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों ने जीवन की दिशा बदली है। बच्चों की दुनिया अब केवल उनके घर, मोहल्ले या गांव तक सीमित नहीं है। मोबाइल और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को उनकी हथेली पर ला दिया है।
हमारी नई पीढ़ी बहुत कुछ जानती है।
लेकिन कई बार उसे यह नहीं पता होता कि वह आई कहां से है।
यह विरोधाभास सोचने पर मजबूर करता है।
आधुनिक होना गलत नहीं है। बदलाव से बचना भी संभव नहीं है। समाज आगे बढ़े, बच्चे अच्छी शिक्षा लें, बड़े शहरों में जाएं, देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाएं—यह हर परिवार की इच्छा है।
लेकिन इस यात्रा में अगर अपनी भाषा, अपने लोकगीत, अपने संस्कार, अपने गांव और अपने बुजुर्गों की स्मृतियां पीछे छूट जाएं, तो हमें कम से कम एक बार रुककर जरूर सोचना चाहिए।
क्योंकि पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि हम आज क्या कर रहे हैं।
पहचान इस बात से भी बनती है कि हम कहां से आए हैं।
उत्तराखंड की परंपराओं में छिपा है समाज का पूरा जीवन
तिवारी जी के साथ बातचीत में उत्तराखंड की पारंपरिक विवाह पद्धतियों और पुराने सामाजिक जीवन का जिक्र हुआ।
वास्तव में पहाड़ में विवाह केवल एक पारिवारिक आयोजन नहीं हुआ करता था।
उसमें रिश्तेदारी थीपड़ोस था।
गांव था, लोकगीत थे, रीति-रिवाज थे।
मिल-जुलकर काम करने की परंपरा थी।
बुजुर्गों का मार्गदर्शन था।
और सबसे बड़ी बात—सामूहिकता थी।
आज शादी का स्वरूप बदल गया है। समारोह बड़े हो गए हैं, साधन बढ़ गए हैं, व्यवस्थाएं आधुनिक हो गई हैं। यह समय का हिस्सा है।
लेकिन क्या हम उस पुराने सामाजिक जुड़ाव को भी अपने साथ लेकर चल पा रहे हैं?
यही चिंता महत्वपूर्ण है।
क्योंकि किसी परंपरा का महत्व केवल इसलिए नहीं होता कि वह पुरानी है। उसका महत्व इसलिए भी होता है कि उसके पीछे एक समाज की सोच और जीवन पद्धति छिपी होती है।
लोकगीतों को केवल गीत समझना भूल होगी
उत्तराखंड की लोक संस्कृति की बात हो और लोकगीतों का जिक्र न हो, ऐसा संभव ही नहीं।
पहाड़ के लोकगीतों में केवल संगीत नहीं है।
उनमें भावनाएं हैं, प्रकृति है, परिवार है, रिश्ते हैं, विरह है, खुशी है, बेटी की विदाई है, मां का मन है।
और पहाड़ के जीवन की अनेक ऐसी तस्वीरें हैं, जिन्हें शायद किसी सरकारी रिपोर्ट या इतिहास की किताब में कभी दर्ज नहीं किया जा सकता।
एक समय था जब परिवारों की महिलाओं को अनेक लोकगीत कंठस्थ होते थे।
शादी-ब्याह में गीत अपने आप शुरू हो जाते थे।
किसी को गीत की किताब देखने की जरूरत नहीं होती थी।
आज वही गीत कई जगह खोजने पड़ते हैं।
कई लोकधुनें ऐसी हैं जिन्हें जानने वाले बुजुर्ग अब बहुत कम रह गए हैं।
यहीं सवाल उठता है—अगर आज हमने इन्हें रिकॉर्ड नहीं किया, लिखा नहीं, सुरक्षित नहीं किया, तो कल इनका क्या होगा?
हमारे बुजुर्ग सिर्फ परिवार के बड़े नहीं, हमारी जीवित विरासत हैं
हमने अपने जीवन में कितनी बार अपने दादा-दादी या नाना-नानी की बातें सुनी होंगी।
उनकी कहानियां कई बार हमें लंबी लगती थीं।
हम सोचते थे कि वही पुरानी बातें फिर शुरू हो गईं।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखें तो महसूस होता है कि उन बातों में हमारे समय से कहीं ज्यादा अनुभव था।
उन्हें पता था कि गांव में किस घर में कौन रहता था।
किस परिवार का किससे क्या रिश्ता है।
किस त्योहार पर क्या होता था।
किस रस्म का क्या अर्थ था।
बारात आने पर कौन क्या जिम्मेदारी संभालता था।
किस तरह पूरा गांव किसी परिवार के सुख-दुख में खड़ा होता था।
ये सब बातें लिखी हुई किताबों में नहीं थीं।
वे लोगों की स्मृति में थीं।
और आज वही स्मृति धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
इसलिए मेरा मानना है कि अगर हमें अपनी लोक संस्कृति को बचाना है तो सबसे पहले हमें अपने बुजुर्गों के पास बैठना होगा।
उनसे पूछना होगा।
उनकी बातें सुननी होंगी।
और उन्हें दर्ज करना होगा।
आज की पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का तरीका भी बदलना होगा
हम अक्सर नई पीढ़ी से कहते हैं कि अपनी संस्कृति को जानो।
लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा कि हम उसे संस्कृति किस तरीके से समझा रहे हैं?
आज का बच्चा मोबाइल पर कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से की जानकारी देख सकता है।
वह वीडियो देखता है।
रील देखता है।
पॉडकास्ट सुनता है।
छोटी-छोटी कहानियों से जानकारी हासिल करता है।
तो फिर अपनी संस्कृति को भी हमें उसी माध्यम से उसके सामने रखना होगा।
अगर किसी गांव की दादी कोई पुराना गीत जानती हैं तो उनका वीडियो रिकॉर्ड कीजिए।
अगर किसी बुजुर्ग को अपने गांव की कोई पुरानी कहानी याद है तो उसे रिकॉर्ड कीजिए।
अगर किसी परिवार में शादी की कोई पुरानी रस्म आज भी निभाई जाती है तो उसे कैमरे में दर्ज कीजिए।
अगर कोई परंपरा अब खत्म होने की कगार पर है तो उसके बारे में लिखिए।
यह काम केवल सरकार या किसी संस्था का नहीं है।
यह परिवार का भी है।
समाज का भी है।
और मीडिया का भी है।
‘गाँव से शहर तक’ क्यों शुरू कर सकता है यह पहल?
एक पत्रकार के रूप में मुझे हमेशा लगता है कि खबर का अर्थ केवल राजनीतिक बयान, सरकारी कार्यक्रम या किसी घटना की रिपोर्टिंग नहीं है।
हमारे समाज में जो बदल रहा है, वह भी खबर है।
जो खो रहा है, वह भी खबर है।
और जिसे बचाने की जरूरत है, वह भी पत्रकारिता का विषय है।
इसी सोच के साथ ‘गाँव से शहर तक’ अपने पाठकों के लिए एक विशेष सांस्कृतिक श्रृंखला शुरू कर सकता है—
“मेरी मिट्टी, मेरी पहचान”
इस पहल का उद्देश्य होगा—अपने घरों, गांवों और बुजुर्गों के पास सुरक्षित उन स्मृतियों को सामने लाना, जो धीरे-धीरे हमारी सामूहिक याददाश्त से गायब हो रही हैं।
हम चाहेंगे कि लोग हमें अपनी कहानियां भेजें।
आप हमें बता सकते हैं—
- आपके गांव में पहले शादी कैसे होती थी?
- कौन-कौन से लोकगीत गाए जाते थे?
- कौन-सी पुरानी रस्म अब नहीं होती?
- आपके दादा-दादी कौन-सी कहानी सुनाते थे?
- गांव में त्योहार कैसे मनाए जाते थे?
- पुराने समय में रिश्ते कैसे निभाए जाते थे?
- गांव में लोग एक-दूसरे की मदद किस तरह करते थे?
- आपके क्षेत्र का कोई ऐसा लोकगीत कौन-सा है जिसे आज बहुत कम लोग जानते हैं?
- आपके गांव या परिवार में कोई ऐसी परंपरा है जिसे आप अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं?
आप चाहें तो इसे लिखकर भेज सकते हैं।
ऑडियो में भेज सकते हैं।
वीडियो बनाकर भेज सकते हैं।
पुरानी तस्वीर के साथ उसकी कहानी भेज सकते हैं।
हमारा प्रयास होगा कि इन स्मृतियों को ‘गाँव से शहर तक’ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए।
एक पुरानी तस्वीर भी इतिहास हो सकती है
कल्पना कीजिए, किसी परिवार के पास 40 या 50 वर्ष पुरानी शादी की तस्वीर है।
आज उस तस्वीर में दिखाई देने वाले कई लोग शायद हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन तस्वीर बची है।
अगर उसके साथ उस शादी की कहानी भी दर्ज हो जाए—कहां शादी हुई थी, कौन-कौन आया था, कौन-सी रस्म हुई थी, कौन-सा गीत गाया गया था—तो वह तस्वीर केवल फोटो नहीं रहेगी।
वह एक समय का दस्तावेज बन जाएगी।
इसी तरह किसी बुजुर्ग की आवाज में रिकॉर्ड किया गया एक लोकगीत आने वाले समय में हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
हम शायद आज इसकी कीमत न समझें।
लेकिन आने वाली पीढ़ी जरूर समझेगी।
संस्कृति को बचाने का मतलब अतीत में लौटना नहीं
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अपनी संस्कृति को बचाने का मतलब यह नहीं है कि हम आधुनिक जीवन को छोड़कर पुराने समय में लौट जाएं।
ऐसा न संभव है और न जरूरी।
हमें आगे बढ़ना है।
हमारे बच्चे आगे बढ़ें, यह जरूरी है।
लेकिन आगे बढ़ते समय पीछे की ओर एक नजर रखना भी जरूरी है।
हम आधुनिक तकनीक अपना सकते हैं और साथ ही अपना लोकगीत भी बचा सकते हैं।
हम शहर में रह सकते हैं और अपने गांव की कहानी बच्चों को सुना सकते हैं।
हम आधुनिक विवाह कर सकते हैं और फिर भी अपनी पारंपरिक रस्मों के अर्थ को जान सकते हैं।
हम अंग्रेजी और हिंदी पढ़ सकते हैं और अपनी मातृभाषा के कुछ शब्द अगली पीढ़ी को सिखा सकते हैं।
यानी सवाल पुराना बनाम नया का नहीं है।
सवाल है—नए के साथ अपने पुराने को कितना बचाकर रखते हैं।
पद से पहचान नहीं, संस्कार से पहचान
धर्मेंद्र तिवारी जी से हुई बातचीत का एक भाव मेरे मन में विशेष रूप से रहा।
व्यक्ति कितना भी बड़ा पद हासिल कर ले, उसकी शुरुआत जिस मिट्टी से हुई है, उसका महत्व कम नहीं होता।
पद बदल सकता है।
जिम्मेदारियां बदल सकती हैं।
शहर बदल सकता है।
जीवनशैली बदल सकती है।
लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी स्मृतियां व्यक्ति के भीतर बनी रहती हैं।
शायद यही कारण है कि बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की जब बातचीत अपनी मिट्टी तक पहुंचती है, तो उसमें एक अलग आत्मीयता दिखाई देती है।
क्योंकि पद हमें समाज में एक स्थान देता है, लेकिन हमारी जड़ें हमें हमारी पहचान देती हैं।
यह पहल सिर्फ उत्तराखंड तक क्यों सीमित रहे?
उत्तराखंड से शुरुआत करना स्वाभाविक है, लेकिन भारत की हर मिट्टी की अपनी कहानी है।
राजस्थान के गांवों की अपनी परंपराएं हैं।
बिहार की अपनी लोककथाएं हैं।
उत्तर प्रदेश के गांवों की अपनी सामाजिक स्मृतियां हैं।
हरियाणा की अपनी लोक परंपराएं हैं।
पूर्वोत्तर के समाजों की अपनी सांस्कृतिक विरासत है।
दक्षिण भारत के गांवों की अपनी परंपराएं हैं।
भारत की असली तस्वीर उसके गांवों और वहां की पीढ़ियों में सुरक्षित है।
इसलिए ‘गाँव से शहर तक’ की कोशिश आगे चलकर इस विचार को देश के दूसरे हिस्सों तक भी ले जा सकती है।
क्योंकि मिट्टी अलग हो सकती है, भाषा अलग हो सकती है, पर अपनी जड़ों से जुड़ने की भावना हर जगह एक जैसी है।
अब आपकी बारी है…
अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग हैं तो आज ही उनके पास बैठिए।
उनसे पूछिए—
“आपके बचपन में गांव कैसा था?”
“आपके समय में शादी कैसे होती थी?”
“कौन-सा गीत गाया जाता था?”
“कौन-सी रस्म अब खत्म हो गई?”
“त्योहार कैसे मनाए जाते थे?”
“लोग एक-दूसरे की मदद कैसे करते थे?”
हो सकता है बातचीत के दौरान आपको ऐसी बातें पता चलें, जिनके बारे में आपने कभी सोचा भी न हो।
उन्हें लिख लीजिए।
रिकॉर्ड कर लीजिए।
सहेज लीजिए।
और अगर आप चाहें तो अपनी कहानी ‘गाँव से शहर तक’ के साथ साझा कीजिए।
क्योंकि हर कहानी प्रकाशित होने के लिए नहीं होती, लेकिन हर महत्वपूर्ण स्मृति को बचाया जाना चाहिए।
हमारी मिट्टी, हमारी जिम्मेदारी
धर्मेंद्र तिवारी जी के साथ हुई बातचीत ने एक बात बहुत स्पष्ट कर दी—संस्कृति केवल संग्रहालयों में सुरक्षित रखने की चीज नहीं है।
वह हमारे घरों में है, हमारी भाषा में है, हमारे गीतों में है, हमारी दादी की आवाज में है, हमारे गांव के रास्तों में है, पुरानी तस्वीरों में है, विवाह की रस्मों में है, त्योहारों में है।
और सबसे ज्यादा हमारी स्मृति में है।
जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम उसे खोने से पहले पहचान लें।
‘गाँव से शहर तक’ के माध्यम से मेरी कोशिश रहेगी कि खबरों के साथ-साथ उन आवाजों को भी जगह मिले, जो समाज की बदलती तस्वीर के बीच धीरे-धीरे दब रही हैं।
क्योंकि पत्रकारिता केवल यह बताने का काम नहीं कि आज क्या हुआ।
कभी-कभी पत्रकारिता का काम यह भी है कि वह समाज से पूछे—
“कल जो था, उसे हम आज कितना बचा पाए?”
और शायद इसी सवाल का जवाब हमारी अगली पीढ़ी के पास होना चाहिए।
पद कितना भी बड़ा हो जाए, अपनी मिट्टी से बड़ा कुछ नहीं।
पद व्यक्ति को जिम्मेदारी देता है,
लेकिन संस्कार उसे पहचान देते हैं।
और जो अपनी जड़ों को संभालकर रखता है, वही आने वाली पीढ़ी को केवल अपना अतीत नहीं देता।
उसे अपनी पहचान भी सौंपता है।
वर्षा चमोली
पत्रकार एवं संपादक
गाँव से शहर तक









