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लोकतंत्र पर अभिजीत दिपके का बड़ा प्रहार: कहा- ‘अब जनता सरकार नहीं चुनती, बल्कि सरकारें अपने हिसाब से वोटर चुन रही हैं’

Abhijeet dipke Source of image google
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नई दिल्ली
चेंज इंडिया फाउंडेशन (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने देश की मौजूदा चुनावी संस्कृति और गिरते लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक तीखी टिप्पणी की है। एक हालिया साक्षात्कार में दिपके ने कहा कि भारत में अब ‘मतदाता द्वारा सरकार चुनने’ का दौर बदल गया है। आज के समय में सत्ताधारी दल अपनी सुविधा और चुनावी गणित के अनुसार ‘वोटर चुन रहे हैं’, जो लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है।
‘वोटर चुनने की सियासत’: दिपके का विश्लेषण
अभिजीत दिपके ने तल्ख लहजे में कहा कि आज राजनीति का स्वरूप पूरी तरह से डेटा और माइक्रो-मैनेजमेंट पर आधारित हो गया है। उन्होंने समझाया कि पार्टियां अब उन मतदाताओं को लक्षित करती हैं जो उनके एजेंडे में फिट बैठते हैं, और बाकी को या तो उपेक्षित कर दिया जाता है या ध्रुवीकरण के जरिए हाशिये पर धकेल दिया जाता है। इस प्रक्रिया को उन्होंने ‘लोकतंत्र का विलोम’ बताया, जहाँ जनता का शासन होने के बजाय, जनता पर शासन करने वालों का नियंत्रण बढ़ गया है।
राजनीतिक दल न बनाने का ठोस कारण
लंबे समय से यह कयास लगाए जा रहे थे कि CJP भविष्य में चुनावी मैदान में उतरेगा, लेकिन दिपके ने इन चर्चाओं पर पूर्ण विराम लगा दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि CJP को एक राजनीतिक दल में तब्दील करना फिलहाल उनके लिए एक आत्मघाती कदम होगा।
दिपके ने अपने तर्क में कहा, “मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था का ढांचा ही ऐसा है कि यदि हम आज पार्टी बनाते हैं, तो इसे तोड़ने के लिए तमाम तरह के प्रलोभन, दबाव और एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाएगा। छोटी और वैचारिक पार्टियों को सिस्टम द्वारा बहुत आसानी से नष्ट कर दिया जाता है। मैं CJP को एक ऐसा खिलौना नहीं बनाना चाहता जिसे सत्ता के गलियारों में आसानी से कुचला जा सके।”
‘जड़ें मजबूत करना पहली प्राथमिकता’
CJP के भविष्य के रोडमैप पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य सत्ता पाना नहीं, बल्कि समाज की चेतना को जगाना है। उन्होंने कहा, “सत्ता तो आज नहीं तो कल मिल जाएगी, लेकिन अगर वैचारिक आधार ही कमजोर रहा, तो कल को वह सत्ता भी किसी दूसरी पार्टी की कठपुतली बन जाएगी। हम एक ऐसा सामाजिक आधार तैयार कर रहे हैं जो किसी नेता या पार्टी की सनक पर नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों पर अडिग रहे।”
सिस्टम के खिलाफ एक मूक क्रांति
दिपके का यह रुख यह दर्शाता है कि वे अब सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर रहकर ‘प्रेशर ग्रुप’ (Pressure Group) के तौर पर काम करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य डिजिटल अभियानों और जमीनी संवाद के जरिए सरकार को जवाबदेह बनाना है। उनका मानना है कि जब तक वोटर खुद को ‘चुने जाने वाले मोहरे’ से ऊपर उठाकर ‘निर्णायक’ की भूमिका में नहीं लाएंगे, तब तक किसी भी नई पार्टी का आना सिर्फ व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाएगा।