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हिमालय की कोख में फिर बिछीं लाशें: चमोली सुरंग हादसे ने उजागर की सुरक्षा मानकों की पोल, कब तक अनदेखी की कीमत चुकाएंगे मजदूर?

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देहरादून / चमोली:
उत्तराखंड के संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में बुनियादी ढांचे का विकास और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। हाल ही में 13 अगस्त को चमोली जिले की विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में हुए दर्दनाक हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। सुरंग के भीतर मरम्मत कार्य के दौरान अचानक भारी मात्रा में पानी और दलदली मलबे के आने से 8 कामगारों की दर्दनाक मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पर्वतीय राज्यों में बड़ी परियोजनाओं को अंजाम देते समय भूगर्भीय सुरक्षा मानकों और चेतावनियों को दरकिनार किया जा रहा है।
खतरे के संकेतों की अनदेखी बनी तबाही की वजह
चमोली के पीपलकोटी में हुए इस हादसे के पीछे निर्माण प्रबंधन की भारी लापरवाही सामने आई है। सुरंग के जिस हिस्से में हादसा हुआ, वहां पिछले काफी समय से रिसाव और दलदल की समस्या देखी जा रही थी। इतना ही नहीं, निर्माण स्थल के ठीक ऊपर कई प्राकृतिक बरसाती नाले बहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक तकनीक का सही मूल्यांकन किए बिना और प्राकृतिक ड्रेनेज को ध्यान में रखे बिना की गई ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग ने पहाड़ की नींव को कमजोर कर दिया। सुरंग धंसने से न केवल अंदर काम कर रहे निर्दोष मजदूरों की बलि चढ़ी, बल्कि पास का दुर्गापुर गांव भी लगातार भूस्खलन के खतरे का सामना कर रहा है।
उत्तराखंड में सुरंग हादसों की डरावनी दास्तान
देवभूमि के लिए सुरंग और जलविद्युत हादसे नए नहीं हैं। इतिहास गवाह है कि बार-बार होने वाली त्रासदियों से कोई सबक नहीं लिया गया:
वर्ष 2010: ऋषिगंगा परियोजना स्थल पर भूस्खलन के कारण 3 मजदूरों की जान गई थी।
वर्ष 2021: तपोवन-ऋषिगंगा आपदा ने भयावह रूप लिया, जिसमें 200 से अधिक लोग लापता हुए और आज भी 100 से ज्यादा लोगों का कोई सुराग नहीं मिल सका।
नवंबर 2023: उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग में 41 मजदूर 17 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला जा सका था।
वर्ष 2025 व 2026: तपोवन और सिल्क्यारा टनल में लगातार मलबा गिरने और लोको-ट्रॉली हादसों में दर्जनों श्रमिक घायल हुए और जानें गईं।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की सख्त जरूरत
हिमालयी क्षेत्रों की अनूठी और कमजोर भौगोलिकता को समझे बिना किए जा रहे भारी-भरकम निर्माण कार्य भविष्य के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि राज्य के आर्थिक विकास के लिए परियोजनाएं जरूरी हो सकती हैं, लेकिन वे इंसानी जिंदगी की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। जब तक निर्माण कंपनियां भूगर्भीय अध्ययन (Geological Survey), आधुनिक निगरानी प्रणाली और आपातकालीन निकास की ठोस व्यवस्था नहीं करेंगी, तब तक इन पहाड़ों में हादसों का यह सिलसिला थमेगा नहीं।
प्रशासन ने पीड़ितों के परिजनों को आर्थिक सहायता की घोषणा तो कर दी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक सुरक्षा मानकों में ढिलाई देकर बेकसूर मजदूरों की जान जोखिम में डाली जाती रहेगी?