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रसोई का बजट बिगड़ा: अंडा-चिकन से लेकर लहसुन-प्याज तक सब कुछ हुआ महंगा, जेब पर बढ़ा भारी बोझ

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नई दिल्ली:
देश भर में आम जनता की रसोई का बजट एक बार फिर बुरी तरह चरमरा गया है। रोजमर्रा की खान-पान की वस्तुओं से लेकर हरी सब्जियों की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। प्रोटीन के मुख्य स्रोत माने जाने वाले अंडा और चिकन से लेकर भारतीय खाने की नींव कहे जाने वाले लहसुन और प्याज के दाम आसमान छू रहे हैं। अचानक हुई इस महंगाई ने मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग की कमर तोड़कर रख दी है।
इन प्रमुख वस्तुओं के दामों में दर्ज की गई भारी बढ़ोतरी:
प्याज और लहसुन: तड़के और ग्रेवी के लिए अनिवार्य माने जाने वाले लहसुन के भाव कई शहरों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। खुदरा बाजार में गुणवत्ता के आधार पर लहसुन काफी ऊंचे दामों पर बिक रहा है। वहीं, प्याज की कीमतों में भी लगातार तेजी दर्ज की जा रही है, जिससे गृहिणियों का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।
अंडा और चिकन: ठंड और बदलती मांग के कारण मुर्गी पालन क्षेत्र पर प्रभाव पड़ा है। पोल्ट्री फार्म्स से आवक प्रभावित होने और दाने (चारा) की बढ़ती लागत के चलते अंडा और चिकन की कीमतों में 15 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है।
हरी सब्जियां और मसाले: टमाटर, हरी मिर्च, धनिया और अन्य मौसमी सब्जियों के दाम भी सामान्य से काफी अधिक हैं। परिवहन लागत बढ़ने और मंडियों में आवक कम होने से यह संकट और गहरा गया है।
महंगाई बढ़ने के मुख्य कारण
बाजार विशेषज्ञों और थोक व्यापारियों के अनुसार, इस महंगाई के पीछे कई बड़े कारण शामिल हैं:
सप्लाई चेन में रुकावट: कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की अनिश्चितता के कारण फसलों को नुकसान पहुंचा है, जिससे थोक मंडियों में माल की आपूर्ति कम हुई है।
परिवहन और ईंधन की लागत: माल ढुलाई के खर्च में बढ़ोतरी होने के कारण अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते सामान की कीमत काफी बढ़ जाती है।
लागत मूल्य में वृद्धि: पशुपालकों और किसानों के लिए बीज, खाद और पोल्ट्री फीड की दरें महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ गई है।
आम जनता और कारोबारियों पर प्रभाव
खाद्य पदार्थों की इस अनियंत्रित तेजी से केवल आम उपभोक्ता ही परेशान नहीं हैं, बल्कि छोटे होटल, ढाबा संचालक और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के सामने भी जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। लागत बढ़ने के बावजूद वे ग्राहकों के डर से अपनी खाने की थाली के दाम तुरंत नहीं बढ़ा पा रहे हैं, जिससे उनका मुनाफा लगभग खत्म हो गया है।
उपभोक्ताओं की मांग है कि सरकार और प्रशासन तुरंत हस्तक्षेप कर मंडियों में जमाखोरी पर लगाम लगाएं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य बनाकर बढ़ती दरों पर अंकुश लगाएं।